मधुबनी : बीच सड़क सहित उसके दोनों ओर से दो से तीन फीट तक कीचड़ के साथ होता है जलजमाव, लोगों का चलना दूभर
बीच सड़क सहित उसके दोनों ओर से दो से तीन फीट तक कीचड़ के साथ होता है जलजमाव, लोगों का चलना दूभर
स्वच्छता पखवाड़ा के बावजूद गंदगी से पटी हैं सड़कें
एक तरफ जिले में स्वच्छता पखवाड़ा मनाया जा रहा है। वहीं, दूसरी तरफ जिला मुख्यालय सहित जिले के अन्य हिस्से में लोग गंदगी व जलजमाव की भीषण त्रासदी को झेल रहे हैं। जिले के कई हिस्से में लोग जलजमाव के कारण दूषित जल के प्रभाव में आने से विभिन्न प्रकार के संक्रामक व गंभीर बीमारियों का लोग शिकार हो रहे हैं। इस समस्या का समाधान किए जाने के बजाय तामझाम से स्वच्छता पखवाड़ा का आयोजन किया जा रहा है। हालांकि इसमें ये अलग बात है कि लोगों की समस्या का समाधान किए जाने के बजाय कागजों पर इसे अधिक मूर्त रूप दिया जा रहा है। इस लापरवाही व गैर जिम्मेदाराना रवैये के कारण जिले के कई हिस्से में लोग डेंगू, मलेरिया जैसे गंभीर बीमारी का शिकार हो रहे हैं। जब मुख्यालय के लोगों के लिए ही जलजमाव व गंदगी जैसी समस्या नासूर बन गई है तो देहाती क्षेत्रों का क्या कहना? वहीं, विशेषज्ञों की मानें तो जहां काम किया जाना है, वहां पूरी तरह से लापरवाही बरती जाती है। कार्यक्रम के आयोजन के लिए भी वैसे स्थानों का चुनाव किया जाता है जहां सभी प्रकार की व्यवस्था चुस्त और दुरुस्त हो। जबकि इस विशेष प्रकार का आयोजन भी वहां से किया जाना अधिक सार्थक प्रतीत होता जहां इस बहाने भी लोगों को नारकीय जीवन जीने से मुक्ति मिल पाती। लेकिन ऐसा नहीं होता है। शहर के लगभग एक दर्जन से अधिक सड़क व कॉलोनी में जलजमाव की समस्या तकरीबन दो महीने से बनी हुई है। लेकिन इस समस्या का समाधान किए जाने के लिए जिम्मेदार पूरी तरह से लापरवाह बने हुए हैं।
शहर की लाइफलाइन समझी जाने वाली सकरी-मधुबनी सड़क पूरी तरह से जानलेवा बन चुकी है। खासकर सड़क निर्माण के लिए किए जाने वाले कार्य और इस दौरान बरती जाने वाली लापरवाही ने सड़क की सूरत और बिगाड़ कर रख दी है। कछुए की गति से चल रहा निर्माण कार्य अब लोगों के लिए नासूर बनता जा रहा है। मालूम हो कि इस सड़क की बदहाल स्थिति वर्ष 2019 से ही है। जब कोतवाली चौक से थाना मोड़ के निकट स्टॉर्म ड्रेनेज प्रोजेक्ट के तहत नाला निर्माण का कार्य शुरू हुआ था। अक्सर देखा जा रहा है कि अधिकांश निर्माण कार्य वर्ष के 9 महीने को छोड़कर बरसात में ही शुरू किया जाता है। संवेदक अथवा विभाग की इस कार्य प्रणाली का दंश लोग लंबे समय से झेलते रहे हैं।
