न्यायायिक सेवा में भी संस्कृत के लिए होगा प्रयास : न्यायाधीश

संस्कृत कार्यक्रमों से परम्पराओं को मिलता है बल : प्रभारी कुलपति
सांस्कृतिक कार्यक्रम में शानदार रही प्रस्तुति
संस्कृत सप्ताह कार्यक्रम के छठे दिन खूब रही गहमागहमी।
दरभंगा।

संस्कृत विश्वविद्यालय में जारी संस्कृत सप्ताह कार्यक्रम के छठे दिन 30 अगस्त को दरबार हॉल में वृहत स्तर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कलाकारों की प्रस्तुति अब्वल दर्जे की थी। आगन्तुक अतिथियों ने विश्वविद्यालय के साथ साथ प्रस्तुतियों को काफी सराहा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रभारी कुलपति प्रो. दिलीप कुमार झा ने कहा कि सांस्कृतिक कार्यक्रम का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति, संस्कार और परंपराओं से जोड़ना भी है। गीत, नाटक और अभिनय के माध्यम से संस्कृत साहित्य में निहित जीवन-मूल्यों, सामाजिक संदेशों तथा नैतिक आदर्शों को सहज एवं प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है। वहीं स्तोत्र-पाठ के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना, अनुशासन एवं भारतीय वाङ्मय की भावभूमि से विद्यार्थियों का परिचय होता है। उक्त जानकारी देते हुए पीआरओ डॉ निशिकान्त ने बताया कि विश्वविद्यालय में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने गीतम्, नाटकम्, स्तोत्र-पाठ, अभिनय सहित विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से भारतीय संस्कृति एवं संस्कृत की समृद्ध परंपरा को जीवंत किया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों की प्रतिभा, रचनात्मकता और संस्कृत के प्रति उनकी अभिरुचि का सुंदर प्रदर्शन देखने को मिला। इसी क्रम में कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश, भागलपुर के मा. प्रशान्त कुमार झा ने संस्कृत व संस्कृति पर विस्तार से विचार रखा। उन्होंने कहा कि संस्कृत देवभाषा है। उनका प्रयास होगा कि इसका उपयोग न्यायिक सेवा में भी हो। साथ ही उन्होंने परिवार में भी इसे अपनाने की भरपूर इच्छा जताई। न्यायाधीश श्री कुमार ने कहा कि संस्कृत विश्वविद्यालय में इस प्रकार के कार्यक्रमों का विशेष महत्व है। यहां संस्कृत का अध्ययन केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रहकर व्यवहार, कला, अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक चेतना से जुड़ता है। मंच पर संस्कृत में संवाद, अभिनय और गीत प्रस्तुत करने से विद्यार्थियों में भाषा के प्रति आत्मविश्वास बढ़ता है इससे संस्कृत को जीवंत और जनसुलभ बनाने में सहायता मिलेगी। विशिष्ट अतिथि जिला कला संस्कृति पदाधिकारी, दरभंगा के चन्दन कुमार ने कहा कि कला व संस्कृति के क्षेत्र में दरभंगा का सर्वोच्च स्थान रहा है। मंच पर संस्कृत में संवाद व सम्बोधन बेशक प्रसंशनीय है।

सारस्वत अतिथि एल.एन.एम.यू., दरभंगा के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकान्त झा ने संस्कृत व संस्कृति को विस्तार से परिभाषित किया। उन्होंने उपाकर्म की क्रिया की प्रसंशा की। वहीं, सारस्वत अतिथि बी.बी.यू. केन्द्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ के सहायक प्राध्यापक डॉ. विपिन कुमार झा ने कहा कि कार्यक्रम में प्रस्तुत नाटकों और अभिनय के माध्यम से विद्यार्थियों ने विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक संदेशों को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा। गीतम् और स्तोत्र-पाठ ने वातावरण को भावपूर्ण एवं संस्कृतमय बना दिया। प्रस्तुतियों को देखकर उपस्थित लोगों ने विद्यार्थियों की प्रतिभा की सराहना की। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि संस्कृति किसी समाज की आत्मा होती है और संस्कृत भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण संवाहिका है। विद्यार्थियों में छिपी कलात्मक प्रतिभा को मंच प्रदान करने वाले ऐसे आयोजन उनके सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे उनमें नेतृत्व क्षमता, सामूहिकता, आत्मविश्वास, अनुशासन तथा अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति गौरव की भावना विकसित होती है। डॉ सुधीर कुमार के संयोजन में यह सांस्कृतिक आयोजन संस्कृत भाषा, भारतीय संस्कृति और युवा प्रतिभा के सुंदर समन्वय का उदाहरण बना।
मुख्य अतिथि सम्मान आयोजन समिति सदस्य डॉ. रामसेवक झा ने किया।

स्नातकोत्तर ज्योतिष विभाग के छात्र विश्वमोहन झा ने वैदिक मंगलाचरण प्रस्तुत किया। कार्यक्रम की संचालिका सहायक प्राचर्या डॉ साधना शर्मा थी जबकि सत्र संयोजक का भार सहायकप्राचार्य डॉ. कमलेन्द्र चक्रपाणि के जिम्मे था। वहीं सहसञ्चालक डॉ. रामसेवक झा थे। बता दें कि करीब बीस तरह की विधाओं में प्रस्तुति दी गयी।
