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बेगूसराय में सिक्स लेन पुल के नामकरण की मांग तेज, पीएम और सीएम को लिखा लेटर।

बेगूसराय के सिमरिया में बिहार के सबसे अति आधुनिक पुल पर परिचालन शुरू होने के बाद अब इसके नामकरण की मांग तेज होने लगी है। लोग इस पुल का नाम दिनकर सेतु, श्रीकृष्ण-दिनकर सेतु, जानकी-जयमंगला सेतु में एक रखने की मांग कर रहे हैं। जिसमें सबसे अधिक मांग दिनकर सेतु रखने की हो रही है।

जिस सिमरिया में आकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुल का उद्घाटन किया, वह राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जन्म भूमि है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मृति न्यास ने इसके लिए प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, गिरिराज सिंह, ललन सिंह उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा, बिहार के मंत्री नितिन नवीन, मोती लाल प्रसाद एवं मुख्य सचिव अमृत लाल मीणा को पत्र लिखा है।

पुल का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री(ये तस्वीर 22-8-2025 की है।)

राजेन्द्र सेतु का निर्माण 1959 में हुआ था

पत्र में लिखा, ‘राष्ट्रकवि दिनकर के सिमरिया, बेगूसराय जिलावासी और जनपदवासी का स्पष्ट मानना है कि सिमरिया गंगा घाट पर नवनिर्मित सेतु का स्वाभाविक नाम दिनकर सेतु होना चाहिए। लेकिन अभी तक इसका नामकरण नहीं किया गया, जो असहज लग रहा है। इसी सिमरिया गंगा घाट पर राष्ट्रकवि दिनकर के सार्थक प्रयास से राजेन्द्र सेतु का निर्माण 1959 में किया गया था।’

‘सिमरिया घाट पर नवनिर्मित पुल का नाम दिनकर सेतु करना उनके प्रति विशेष श्रद्धांजलि मानी जाएगी और नई पीढ़ी को वैचारिक रूप से यह बहुत ही प्रभावित करेगा। राष्ट्रकवि दिनकर की कविताओं को पूरा देश गा रहा है, चाहे युद्ध हो या बुद्ध, सड़क हो या संसद, ऐसे लोककंठ के कवि की जन्मभूमि सिमरिया में नवनिर्मित पुल का नाम दिनकर सेतु करना श्रेयस्कर रहेगा।’

दिनकर जी का समाज और राष्ट्र को समर्पित किया

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 को सिमरिया में हुआ था। दिनकर बिहार और भारत ही नहीं पूरे विश्व के गौरव हैं। उनका परिचय लिखना सूर्य को दीपक दिखाने के समान होगा। उनकी कविताएं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय देश के कोने-कोने में अत्यन्त गौरव के साथ पढ़ी और गायी जाती थी। ओजस्वी आजादी की लड़ाई में सर्वस्व न्योछावर करने के लिए प्रेरित करती थी।

राष्ट्रकवि दिनकर राष्ट्रीय चेतना, स्वाभिमान एवं संवेदना के ओजस्वी कवि थे। आज भी उनकी कृतियों के अध्ययन और मनन से अन्याय एवं शोषण के खिलाफ संघर्ष की अद्भुत शक्ति मिलती है। दिनकर साहित्य की गरिमा, महिमा, गौरव, प्रतिष्ठा और प्रभाव है। दिनकर जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन समाज और राष्ट्र को समर्पित किया।

उनकी कालजयी कृति परशुराम की प्रतीक्षा और संस्कृति के चार अध्याय के प्रकाशन के स्वर्ण जयंती अवसर पर 22 मई 2015 को विज्ञान भवन नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने खुद भी दिनकर जी को ऋषि एवं लोककंठ का कवि कहा। लोककंठ के कवि और शोषित वंचित समाज की आवाज की संज्ञा दी तो पुल का नामकरण कर सच्ची श्रद्धांजलि दी जाए।

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