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मासूम बच्चे ने रोज़ा रखने के हर काम (सेहरी से इफ्तार) को बखूबी बरकरार रखा और अपनी ज़िंदगी का पहला रोज़ा मुकम्मल किया। उमैर ने अपने परिवार के साथ सहरी (सुबह के वक्त खाना) की और फिर पूरे दिन भूखे प्यासे रहते हुए रोज़ा रखने के नियमों का पालन किया। शाम में इफ्तार (शाम के वक्त खाना) के साथ उन्होंने रोज़ा खोला। उमैर के पहले रोज़े पर प्रियजनों ने खुशी का इज़हार किया और भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं। मौलाना मोहम्मद अनवारुल हक क़ासमी (मोहम्मद उमैर के पिता) ने कहा कि देश में नफ़रत का माहौल है, अमन चैन ख़त्म हो चुका है।
साढ़े 3 साल की उम्र में मेरे बेटे ने रोज़ा रखकर सबकी हिफ़ाज़त और देश में अमन चैन की दुआएं मांगी। बहुत खुशी हो रही है कि उमैर ने बहुत ही कम उम्र में अपना पहला रोज़ा रखा है। मोहम्मद उमैर की छोटी सी उम्र इबादत ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है, लोगों का कहना है कि इस उम्र में रोज़ा रखना वाकई सोचने वाली बात है। क्योंकि बच्चों को यह समझाना कि सुबह से शाम तक कुछ नहीं खाना है। कुछ खाने से रोज़ा टूट जाएगा, आंख के सामने सब चीज़ होते हुए भी बच्चे ने सब्र करते हुए रोज़ा रखा, यह काफी सराहनीय है।

मौलाना मोहम्मद अनवारुल हक क़ासमी के बेट मोहम्मद उमैर ने छोटी से उम्र में ही रोजा रख आस्था का गहरा संदेश दिया है।