Monday, April 20, 2026
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नीतीश कुमार की दिल्ली पर नजर… लखनऊ की राह, अखिलेश यादव से मुलाकात और मायावती के तेवर।

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बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने डॉन से राजनेता बने आनंद मोहन की समय से पहले रिहाई की सुविधा के लिए जेल मैनुअल में संशोधन करने का मुद्दा छेड़ दिया है। उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की आलोचना की। आनंद मोहन पर 1994 में आंध्र प्रदेश (अब तेलंगाना) के एक युवा आईएएस अधिकारी और गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी. कृष्णैया की हत्या का आरोप लगा था। इस मामले में उन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई। दरअसल, मुजफ्फरपुर के गैंगस्टर छोटन शुक्ला के अंतिम संस्कार जुलूस के दौरान जी. कृष्णैया की हत्या हुई थी।

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नीतीश सरकार ने 10 अप्रैल को बिहार जेल मैनुअल 2012 में संशोधन कर दिया। पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ दास कहते हैं कि ‘ड्यूटी पर एक लोक सेवक की हत्या’ खंड को इससे हटा दिया गया। गृह विभाग (जेल) की ओर से इस आशय की एक औपचारिक अधिसूचना जारी कर दी। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले 15 वर्षों से सहरसा जेल में बंद आनंद की जल्द रिहाई करा सकती है। बसपा सुप्रीमो ने इस मामले को दलित विरोधी करार दे दिया है।

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मायावती ने कहा कि पूरे देश के दलित समुदाय में नीतीश कुमार के इस फैसले को लेकर बड़ा गुस्सा है। उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री से सरकार के फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा है। उन्होंने कहा कि तेलंगाना के महबूबनगर के रहने वाले एक गरीब दलित समुदाय के एक बेहद ईमानदार आईएएस अधिकारी जी. कृष्णैया की जघन्य हत्या के मामले में आनंद मोहन को रिहा करने की तैयारी है। नीतीश सरकार की यह दलित विरोधी योजना ने सभी को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। उन्होंने इसे नकारात्मक राजनीति करार दिया।

मायावती ने कहा कि आनंद मोहन बिहार में कई सरकारों की मजबूरी रहे हैं। तत्कालीन गोपालगंज डीएम की हत्या के मामले में नीतीश सरकार के दलित विरोधी कार्य ने देश में इस वर्ग के गुस्से को बढ़ा दिया है। उन्होंने कहा कि चाहे जो भी मजबूरियां हों, बिहार सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। दरअसल, आनंद मोहन को पिछले छह महीनों में तीन बार पैरोल दी जा चुकी है। अक्टूबर 2007 में एक स्थानीय अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी। दिसंबर 2008 में पटना हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील करने पर इसे उम्र कैद में बदल दिया था।

अखिलेश यादव और नीतीश कुमार की सोमवार को प्रस्तावित मुलाकात के पहले यूपी में मायावती के बयान के बाद मुद्दा गरमा गया है। दरअसल, अखिलेश यादव इन दिनों मायावती के दलित वोट बैंक को अपने पाले में लाने की कोशिशों में जुटे हैं। भाजपा के अलावा सपा की ओर से भी दलित वोट बैंक को अपने पाले में लाने का प्रयास है। ऐसे में दलित अधिकारी की हत्या में सजा पाए आरोपी को रिहा करने के लिए कानून बदलने का मुद्दा उठाकर नीतीश के साथ-साथ बसपा सुप्रीमो ने अखिलेश को भी घेर लिया है। इस मामले को लेकर वे अपनी राजनीति को अलग तरीके से करने की तैयारी कर रही हैं। नीतीश कुमार के साथ-साथ बसपा की कोशिश अखिलेश यादव को भी दलित विरोधी करार देने की है। ऐसे में नीतीश-अखिलेश मुलाकात का मुद्दा यूपी में अलग रंग ले सकता है।

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