बाद में केंद्र ने इस हिस्से को हटाते हुए नया हलफनामा दायर किया। इसमें कहा- ‘पैरा 5 अनजाने में शामिल हो गया था। नया हलफनामा संवैधानिक और कानूनी स्थिति साफ करने के लिए दायर किया है। केंद्र सरकार भारत के संविधान के प्रावधानों के अनुसार SC/ST/SEBC और OBC के स्तर को उठाने के लिए सभी कदम उठा रही है।’
नए हलफनामे से स्पष्ट हो गया कि राज्य जातीय सर्वे या उससे जुड़े आंकड़े जुटा सकते हैं। इससे पहले बिहार सरकार पटना हाईकोर्ट में कह चुकी है कि यह जनगणना नहीं बल्कि सर्वे है। इसके बाद ही पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार को सर्वे कराने को हरी झंडी दे थी।
इससे पहले 21 अगस्त को सुनवाई हुई थी। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें दी थीं। उन्होंने कहा था कि वे इस केस में किसी पक्ष के साथ नहीं हैं। केवल इसके रिजल्ट को लेकर अपना पक्ष रखना चाहते हैं। जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस भट्टी की कोर्ट से मेहता ने 7 दिन का समय मांगा था। इसके बाद 28 अगस्त की तारीख दे दी गई थी।
कोर्ट में बिहार सरकार ने दलील देते हुए कहा कि राज्य में गणना का काम 6 अगस्त को पूरा हो चुका है। सारे डेटा भी ऑनलाइन अपलोड कर दिए गए हैं। इसके बाद याचिकाकर्ता ने डेटा रिलीज करवाने की मांग की थी।
हलफनामे में सरकार ने कहा है कि जनगणना का विषय संविधान की सातवीं अनुसूची की केंद्रीय सूची में एंट्री 69 में आता है। केंद्र ने इसमें दी गई शक्ति का इस्तेमाल करते हुए जनगणना कानून 1948 बनाया है। इस कानून की धारा तीन में सिर्फ केंद्र सरकार को जनगणना करने का अधिकार दिया गया है। संविधान के तहत किसी और संस्था या निकाय को जनगणना या जनगणना जैसी कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है।





