Sunday, June 21, 2026
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ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के संगीत एवं नाट्य विभाग, ललित कला संकाय द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय नाट्य कार्यशाला का समापन

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ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के संगीत एवं नाट्य विभाग, ललित कला संकाय द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय नाट्य कार्यशाला का समापन प्रेमचन्द की कालजयी कहानियों “कफन” एवं “सद्गति” पर आधारित चर्चित नाट्य प्रस्तुति “मर रही मानवता” के सफल मंचन के साथ संपन्न हुआ। सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदनाओं को केन्द्र में रखकर प्रस्तुत इस नाटक ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया तथा पूरे सभागार को भावनात्मक और चिंतनशील वातावरण से भर दिया।

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नाटक “मर रही मानवता” ने समाज में बढ़ती संवेदनहीनता, शोषण, गरीबी, जातिगत भेदभाव और मानवीय मूल्यों के निरंतर होते क्षरण को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से मंच पर प्रस्तुत किया। प्रेमचन्द की रचनाओं से प्रेरित यह प्रस्तुति केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रही, बल्कि दर्शकों के समक्ष अनेक सामाजिक प्रश्न भी छोड़ गई। कलाकारों के सशक्त अभिनय, प्रभावपूर्ण संवाद और जीवन्त मंचीय प्रस्तुति ने नाटक को विशेष ऊँचाई प्रदान की।

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कार्यक्रम की संयोजक एवं विश्वविद्यालय संगीत एवं नाट्य विभाग की विभागाध्यक्ष लावण्य कीर्ति सिंह ‘काव्या’ ने कहा कि रंगमंच समाज का दर्पण है और उसका उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को जागरूक एवं संवेदनशील बनाना भी है। उन्होंने कार्यशाला में शामिल सभी प्रतिभागियों, कलाकारों एवं सहयोगियों के समर्पण और परिश्रम की सराहना करते हुए सफल आयोजन के लिए शुभकामनाएँ दीं।

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नाटक का नाट्य रूपांतरण, परिकल्पना एवं निर्देशन भिखारी ठाकुर युवा सम्मान प्राप्त कुन्दन कुमार द्वारा किया गया। उनके कुशल निर्देशन में कलाकारों ने अपने-अपने पात्रों को जीवन्त कर दिया। मंचन के दौरान दर्शकों की भावनात्मक सहभागिता स्पष्ट दिखाई दी और प्रस्तुति के अंत में कलाकारों को लंबे समय तक तालियों की गड़गड़ाहट से सम्मानित किया गया।
कार्यशाला के दौरान बिहार बाल भवन किलकारी, दरभंगा के नाट्य विभाग के बच्चों एवं एलएनएमयू, दरभंगा के नाट्य विभाग के विद्यार्थियों के बीच एक विशेष संवाद कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया। इस संवाद का उद्देश्य दोनों पीढ़ियों के रंगकर्मियों के बीच रंगमंचीय गतिविधियों, अनुभवों और कलात्मक दृष्टिकोणों का आदान-प्रदान सुनिश्चित करना था। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के हिन्दी साहित्य विभाग के सहायक प्राध्यापक और वरीय रंगकर्मी डॉ कमलेन्द्र चक्रपाणि उपस्थित रहे। वहीं किलकारी दरभंगा के प्रमंडल कार्यक्रम समन्वयक रवि मुकुल ने बच्चों को सृजनात्मक गतिविधियों से निरंतर जुड़े रहने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के भू-सम्पदा पदाधिकारी डॉ कामेश्वर पासवान की भी महत्वपूर्ण उपस्थिति रही। उन्होंने इस नाटक को सराहनीय बताया। सभी वक्ताओं ने रंगमंच को सामाजिक चेतना, रचनात्मक अभिव्यक्ति और पीढ़ियों के बीच संवाद का सशक्त माध्यम बताया।
“मर रही मानवता” में घीसू की भूमिका में हरीशचन्द्र कुमार, माधव के रूप में विनोद कुमार विश्वकर्मा, बुधिया के रूप में प्रिया कुमारी, एडम की भूमिका में देवनन्दन कुमार, जिंदा लाश के रूप में उत्पल झा, चमार की भूमिका में मनीष कुमार तथा झुरिया के रूप में ज्योति कुमारी ने प्रभावशाली अभिनय का परिचय दिया। वहीं कोरस दल में रवीन्द्र कुमार साफी, त्रिलोकी पाण्डेय, पूजा कुमारी एवं एकता भारती ने प्रस्तुति को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मंच के पीछे तकनीकी दल का योगदान भी सराहनीय रहा।संगीत के छात्र मृत्युंजय कुमार ने हारमोनियम तथा हेमन्त कुमार ने ढोलक वादन द्वारा प्रस्तुति को संगीतात्मक ऊर्जा प्रदान की। रौशन कुमार ने पार्श्व संगीत एवं प्रकाश परिकल्पना का दायित्व निभाया। वस्त्र विन्यास चक्रपाणि पाण्डेय द्वारा, सेट एवं प्रॉप्स की व्यवस्था सौरभ कुमार द्वारा तथा मंच परिकल्पना मृत्युंजय शर्मा, ज़ीशान फ़ज़ल एवं मो ग़ालिब द्वारा की गई।
उल्लेखनीय है कि मुंशी प्रेमचन्द की अमर कहानियों पर आधारित यह नाट्य प्रस्तुति कार्यशाला के प्रतिभागियों के लिए सीख और अनुभव का महत्वपूर्ण अवसर साबित हुई। सफल मंचन के साथ कार्यशाला का समापन हुआ और “मर रही मानवता” ने दर्शकों के मन में मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक चेतना का एक गहरा संदेश छोड़ दिया।

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