Wednesday, June 10, 2026
Homeअंतर्राष्ट्रीय नेत्रदान दिवस (10 जून) विशेष

अंतर्राष्ट्रीय नेत्रदान दिवस (10 जून) विशेष

- Advertisement -

आंखें हुईं बंद, लेकिन रोशनी रही जिंदा

- Advertisement -

मिथिलांचल में महादान का प्रेरक अभियान, 33 नेत्रदानों ने बदली कई जिंदगियां, 66 कॉर्निया बने नई उम्मीद की किरण

- Advertisement -

बिहार में हर वर्ष 12 हजार कॉर्निया की जरूरत, एक निर्णय दो जिंदगियों में ला सकता है उजाला

- Advertisement -

किसी अपने की अंतिम विदाई का क्षण जीवन का सबसे गहरा दुःख होता है। उस समय हर आंख नम होती है, हर दिल भारी होता है और हर स्मृति भीतर तक झकझोर देती है। लेकिन कुछ परिवार ऐसे भी होते हैं, जो अपने इस असहनीय दुःख के बीच मानवता का ऐसा दीप जलाते हैं, जिसकी रोशनी किसी अनजान व्यक्ति के जीवन को हमेशा के लिए बदल देती है। वे अपने प्रियजन की आंखें दान कर यह संदेश देते हैं कि इंसान भले ही इस दुनिया से चला जाए, लेकिन उसकी रोशनी हमेशा जीवित रह सकती है।

इसी मानवीय सोच ने मिथिलांचल में नेत्रदान को एक प्रेरक जनआंदोलन का रूप दिया है। दधीचि देहदान समिति, दरभंगा के सतत प्रयासों से अब तक 33 नेत्रदान (66 कॉर्निया) तथा 5 देहदान संपन्न हो चुके हैं। यह केवल आंकड़े नहीं, बल्कि 38 ऐसे परिवारों की संवेदनशीलता, साहस और करुणा की कहानी है, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत दुःख को समाज के लिए आशा और जीवन का संदेश बना दिया।

अंतर्राष्ट्रीय नेत्रदान दिवस के अवसर पर यह याद रखना आवश्यक है कि नेत्रदान केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि मृत्यु के बाद भी मानवता की सेवा का सबसे प्रभावी माध्यम है।

बिहार में प्रतिवर्ष लगभग 12 हजार कॉर्निया की आवश्यकता होती है, जबकि प्रत्यारोपण के लिए उपलब्ध कॉर्निया की संख्या केवल कुछ सौ तक ही सीमित रहती है। इसका परिणाम यह होता है कि हजारों दृष्टिबाधित लोग वर्षों तक किसी अनजान दानी परिवार के निर्णय का इंतजार करते रहते हैं।

दधीचि देहदान समिति के प्रयासों से प्राप्त कॉर्निया में से आवश्यकता पड़ने पर 10 कॉर्निया अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), पटना भेजे गए, जहां सफल प्रत्यारोपण के माध्यम से जरूरतमंद मरीजों को नई दृष्टि मिली। जिन लोगों की दुनिया अंधकार में डूबी हुई थी, उनके जीवन में रंग लौट आए।

वहीं 5 महादानियों के देहदान ने चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान को नई दिशा दी है। उनकी देह आज भी मेडिकल छात्रों के लिए ज्ञान का माध्यम बनकर भविष्य के चिकित्सकों को तैयार कर रही है। सचमुच, यह ऐसा दान है जो मृत्यु के बाद भी समाज की सेवा करता रहता है।

इस पुनीत अभियान में स्व. बसुधा झा, स्व. बद्री प्रसाद महनसरिया, स्व. गुंजेश्वरी देवी पाठक, स्व. प्रेमलता देवी पोद्दार, स्व. रामबालक यादव, स्व. चंदा देवी पोद्दार, स्व. अरुण कुमार डिडवानिया, स्व. यशोदा देवी सरावगी, स्व. डॉ. पुष्पा कुमारी, स्व. दुर्गा देवी सरावगी, स्व. गोपाल कृष्ण सरावगी, स्व. प्रेमा देवी बोथरा (अररिया), स्व. संतोष गोयल (अररिया), स्व. मोहन लाल खेतान, स्व. मंजु बाजोरिया (समस्तीपुर), स्व. नन्दकिशोर बोहरा, स्व. सुधा देवी कानोडिया, स्व. शरद जोशी, स्व. संत कुमार नाथानी, स्व. रमेश कुमार सर्राफ, स्व. श्याम सुंदर चौधरी, स्व. गीता देवी (समस्तीपुर), स्व. भगवती कुमारी दास (मधुबनी), स्व. गीता देवी खेतान, स्व. श्याम सुंदर जसराजपुरिया, स्व. माधव दारुका, स्व. दायसुंदरी देवी, स्व. बिमल प्रसाद कानोडिया, स्व. ललिता शर्मा, स्व. प्रमोद कुमार दारुका, स्व. निर्मल कानोडिया, स्व. उर्मिला देवी जाजोदिया, स्व. ओम प्रकाश सर्राफ, स्व. जयसूर्या कुमारी लिल्हा तथा स्व. गीता देवी लुहारुका सहित अनेक महादानी परिवारों का योगदान सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा।

इन परिवारों ने अपने प्रियजनों को केवल विदा नहीं किया, बल्कि उन्हें अनगिनत लोगों की आंखों की रोशनी और चिकित्सा शिक्षा का अमर हिस्सा बना दिया।

समिति के कार्यों की सामाजिक उपयोगिता और मानवीय प्रभाव को देखते हुए बिहार सरकार ने भी इसे विशेष मान्यता दी है। समिति के आग्रह पर स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस के मुख्य सरकारी समारोहों में नेत्रदानी एवं देहदानी परिवारों को सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय अंगदान दिवस के अवसर पर पटना में आयोजित राज्य स्तरीय समारोहों में समिति तथा महादानी परिवारों को बिहार के तत्कालीन राज्यपाल श्री राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर, श्री आरिफ मोहम्मद खान तथा सिक्किम के पूर्व राज्यपाल एवं समिति के अध्यक्ष श्री गंगा प्रसाद के कर-कमलों द्वारा सम्मानित किया जाता रहा है।

दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के स्थापना दिवस 2026 के अवसर पर भी नेत्रदान करने वाले दिवंगत दाताओं को श्रद्धांजलि अर्पित की गई तथा उनके परिजनों को सम्मानित कर समाज ने उनके त्याग और मानवता को नमन किया।

देहदानी प्रेमलता देवी पोद्दार के भतीजे मितेश पोद्दार कहते हैं—

“मेरी बुआ ने जाते-जाते भी समाज को जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया है। उनकी देह अब चिकित्सा के छात्रों के लिए ज्ञान का माध्यम बनेगी, यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है।”

नेत्रदानी बद्री प्रसाद महनसरिया के पुत्र आनंद महनसरिया कहते हैं—

“पिताजी की आंखें आज भी इस दुनिया को देख रही हैं। यह सोचकर हमारा दुःख कम हो जाता है। उनके इस महादान ने किसी अंधेरे घर में रोशनी का चिराग जलाया है।”

नेत्रदानी यशोदा देवी सरावगी के पुत्र सुबोध सरावगी भावुक होकर कहते हैं—

“माँ की ममता को हमने उनकी आंखों के दान के जरिए जीवित रखा है। बिछड़ने का गम तो है, लेकिन गर्व इस बात का है कि उनकी दृष्टि से किसी का जीवन रोशन हुआ है।”

समिति का संदेश

समिति के अध्यक्ष एवं सिक्किम के पूर्व राज्यपाल श्री गंगा प्रसाद तथा महासचिव पद्मश्री विमल जैन का कहना है “नेत्रदान मृत्यु के बाद भी मानवता की सेवा का सबसे प्रभावी माध्यम है। जब हम किसी दूसरे को रोशनी देकर जाते हैं, तभी सही मायनों में अमर होते हैं।”

क्षेत्रीय संगठन मंत्री मनमोहन सरावगी कहते हैं “बिहार में कॉर्निया की आवश्यकता और उपलब्धता के बीच का अंतर केवल जनसहभागिता और सतत जागरूकता से ही कम किया जा सकता है।”

दरभंगा इकाई के अध्यक्ष राजेश बोहरा कहते हैं “जब किसी व्यक्ति की आंखें बंद होती हैं, तब भी उनकी रोशनी किसी दूसरे के जीवन में सूरज बनकर चमक सकती है।”

सचिव कुमार आदर्श का कहना है “हर परिवार को नेत्रदान की जानकारी होनी चाहिए, ताकि कठिन समय में लिया गया एक निर्णय किसी जरूरतमंद को नई जिंदगी दे सके।”

दधीचि देहदान समिति का मुख्य उद्देश्य लोगों को मरणोपरांत नेत्रदान के लिए जागरूक करना है। नेत्रदान में मृत्यु के बाद आंख का केवल पारदर्शी भाग अर्थात कॉर्निया दान किया जाता है। पूरी आंख नहीं निकाली जाती। इसी कॉर्निया के प्रत्यारोपण से किसी दृष्टिबाधित व्यक्ति को नई रोशनी मिल सकती है।

नेत्रदान के मुख्य नियम

कोई भी व्यक्ति किसी भी उम्र, लिंग या ब्लड ग्रुप का हो, नेत्रदान कर सकता है।
मधुमेह, उच्च रक्तचाप या चश्मा पहनने वाले या बीमार व्यक्ति भी नेत्रदान कर सकते हैं।
मृत्यु के 6 घंटे के भीतर नेत्रदान हो जाना आवश्यक है।

महत्वपूर्ण तथ्य

नेत्रदान जीवित रहते हुए नहीं किया जा सकता।
नेत्रदान के लिए मृत व्यक्ति के परिवार की सहमति आवश्यक होती है।
कुछ गंभीर नेत्र रोगों की स्थिति में भी आंखें चिकित्सा अनुसंधान एवं अध्ययन के लिए उपयोगी हो सकती हैं।

इस महान अभियान के पीछे समर्पित कर्मयोगियों की एक पूरी टीम निरंतर कार्य कर रही है। समिति के डॉ. हरि दामोदर सिंह, डॉ. बलजीत खेड़ा, उमेश प्रसाद, संजय कुमार, मितेश पोद्दार, प्रशांत कुमार रवि, धरम कुमार, सुबोध सरावगी एवं आनंद महनसरिया आदि मानवता की इस अलख को घर-घर तक पहुंचाने में जुटे हैं।

संपर्क सूत्र (महादान हेतु)
मनमोहन सरावगी: 9431219884
सूरज कुमार (पटना): 8084053399

विशेष अनुरोध. संपर्क सूत्र जरूर दें ताकि जागरूक व्यक्ति इस अभियान से जुड़ सकें.नेत्रदान अभियान की सफलता में विभिन्न आई बैंकों और मेडिकल कॉलेजों का सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (DMCH) के आई बैंक ने इस दिशा में उल्लेखनीय सहयोग प्रदान किया है। विभागाध्यक्ष डॉ. आसिफ शहनवाज़ जी तथा आई बैंक प्रभारी डॉ. रंधीर जी के सकारात्मक एवं संवेदनशील रवैये के कारण दरभंगा क्षेत्र में नेत्रदान की प्रक्रिया सुचारु रूप से संचालित की जा रही है।
हालांकि राज्य के कुछ अन्य चिकित्सा संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों में भी नेत्रदान को बढ़ावा देने के लिए अधिक सक्रिय एवं संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता महसूस की जाती है। यदि प्रत्येक मेडिकल कॉलेज और आई बैंक नेत्रदान को प्राथमिकता देकर जागरूकता एवं समन्वय बढ़ाएं, तो कॉर्निया की कमी को काफी हद तक दूर किया जा सकता है।नेत्रदान अभियान की सफलता में विभिन्न आई बैंकों और मेडिकल कॉलेजों का सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है।

दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (DMCH) के आई बैंक ने इस दिशा में उल्लेखनीय सहयोग प्रदान किया है। विभागाध्यक्ष डॉ. आसिफ शहनवाज़ जी तथा आई बैंक प्रभारी डॉ. रंधीर जी के सकारात्मक एवं संवेदनशील रवैये के कारण दरभंगा क्षेत्र में नेत्रदान की प्रक्रिया सुचारु रूप से संचालित की जा रही है।
हालांकि राज्य के कुछ अन्य चिकित्सा संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों में भी नेत्रदान को बढ़ावा देने के लिए अधिक सक्रिय एवं संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता महसूस की जाती है। यदि प्रत्येक मेडिकल कॉलेज और आई बैंक नेत्रदान को प्राथमिकता देकर जागरूकता एवं समन्वय बढ़ाएं, तो कॉर्निया की कमी को काफी हद तक दूर किया जा सकता है।

- Advertisement -
RELATED ARTICLES

Most Popular