दरभंगा। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग में सावित्रीबाई फुले की जयंती विभागाध्यक्ष प्रो.उमेश कुमार की अध्यक्षता में शनिवार को आयोजित की गई। भारत की पहली शिक्षिका सावित्रीबाई फुले की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए प्रो. उमेश ने कहा कि सावित्रीबाई फुले से कई वर्षों पहले पहले वैदिक साहित्य में स्त्री शिक्षा के कई उद्धरण मिलते हैं। यद्यपि आधुनिक स्कूली शिक्षा की शुरुआत सर्वप्रथम फुले–दंपत्ति ने किया। स्त्री–शिक्षा विशेषतः निम्नवर्गीय महिलाओं की शिक्षा के लिए जो कार्य इन्होंने किया वो इतिहास में सदैव स्मरण किया जाएगा। अफ़सोस की बात है कि आज भी मुख्य धारा से इतर महिलाओं की शैक्षणिक स्थिति चिंतनीय है। सावित्रीबाई फुले के सपनों को साकार करने के लिए हमें वंचित महिलाओं के बीच शिक्षा–दान का संकल्प लेना चाहिए। उनके सपनों का समाज सामूहिक प्रयास से बन सकेगा।
विभागीय प्राध्यापक डॉ.सुरेन्द्र प्रसाद सुमन ने कहा कि फुले–दंपत्ति भारतीय क्रांति के अग्रदूत हैं। ज्योतिबा फुले ने सावित्रीबाई फुले के साथ कदम से कदम मिलाकर हजारों साल पुरानी दासता के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। सावित्रीबाई फुले का सामाजिक आंदोलन के साथ–साथ साहित्यिक क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान है। उनके साहित्यिक अवदान को सामने लाने के लिए शोध की जरूरत है। उनके सामाजिक–आर्थिक समानता के स्वप्न आज भी अधूरे हैं, जिनके लिए हमें अनवरत संघर्ष करना होगा। इस मौके पर डॉ.महेश प्रसाद सिन्हा ने कहा कि सावित्री बाई फुले ने जिस समय और आयु में घर की दहलीज लांघ कर सामाजिक परिवर्तन के लिए शिक्षा का आंदोलन शुरू किया था, वह भीषण पितृसत्तात्मक दौर था। उस दौर में स्त्रियों को शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नहीं था। उन्होंने इस शोषणकारी व्यवस्था से टकराते हुए स्त्री–अधिकारों और स्त्री–शिक्षा के लिए अविस्मरणीय कार्य किया। आज के इस पूंजीवादी और व्यक्तिवादी समय में अपने सीमित दायरे से निकलकर सामाजिक उत्थान के लिए काम करना ही सावित्रीबाई फुले के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
प्राध्यापिका डॉ.मंजरी खरे ने कहा कि आज मैं जीवन में जहां भी हूं, उसमें माता–पिता के अलावा सावित्रीबाई फुले का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है। मेरा व्यक्तिगत प्रयास रहता है कि महिला शिक्षार्थियों के लिए जितना कर पाऊं, उतना जरूर करूं। अध्यापन करते हुए मैंने यह अनुभव किया है कि महिला शिक्षार्थियों को यातायात की असुविधा का सामना करना पड़ता है, जिसके कारण उनकी पढ़ाई बहुत प्रभावित होती है। इसलिए सावित्रीबाई फुले जी की जयंती पर मैं यह प्रस्ताव देना चाहती हूं कि महिला शिक्षार्थियों के लिए यातायात की समुचित सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। शिक्षा के माध्यम से ही सावित्रीबाई फुले के स्वप्न पूरे होंगे।
कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी सुभद्रा कुमारी तथा धन्यवाद ज्ञापन समीर ने किया। मौके पर वरीय शोधप्रज्ञ दुर्गानंद ठाकुर, खुशबू कुमारी, मलय नीरव, बबीता कुमारी, जयप्रकाश कुमार, कंचन रजक, अपर्णा कुमारी, शिवानी कुमारी, ओमप्रकाश निराला, नबी हुसैन सहित स्नातकोत्तर छात्र–छात्राएं बड़ी संख्या में उपस्थित थे।



