यह मंदिर देश के अन्य मंदिरों से अलग है। यहां सैकड़ों वर्षों से परंपरा चली आ रही है कि मुख्य पुजारी महिला ही होती हैं। वर्तमान में अवंतिका मिश्रा मुख्य पुजारी हैं। उनके सहयोग में पुरुष पंडित रहते हैं, लेकिन देवी अहिल्या को स्पर्श कर पूजा करने का अधिकार केवल महिला पुजारी को है। पुरुष पुजारी को स्पर्श पूजा की अनुमति नहीं है।
देश में शायद यह एकमात्र मंदिर है जहां महिला पुजारी पूजा-अर्चना कराती हैं।
मंदिर में बैगन का भार चढ़ाने की है मान्यता
स्थानीय मान्यता है कि शरीर पर होने वाले मास्सा, जिसे आम बोलचाल में अहिला कहा जाता है, उससे पीड़ित लोग यहां सच्चे मन से मन्नत मांगते हैं तो वह ठीक हो जाता है। इसके बाद लोग यहां बैगन का भार चढ़ाते हैं। रामनवमी पर यहां भव्य मेला का भी आयोजन किया जाता है जिसमें देश के विभिन्न कोने से लोग आते हैं। यहां हजारों के संख्या में नेपाल भी लोग आकर माता का दर्शन पूजन करते हैं।
मिथिला में एक प्रमुख तीर्थ स्थल है अहिल्या स्थान। हालांकि सरकारी उदासीनता के कारण यह वर्षों से उपेक्षित रहा है। यहां देवी अहिल्या को समर्पित एक मंदिर है। रामायण में गौतम ऋषि की पत्नी देवी अहिल्या का जिक्र है। देवी अहिल्या गौतम ऋषि के श्राप से पत्थर बन गई थीं। जिनका भगवान राम ने उद्धार किया था।
सरकारी उदासीनता के कारण माता अहिल्या का मंदिर वर्षों से उपेक्षित रहा है।
अब जानिए क्या है प्रचलित कहानी
प्रचलित कथा के अनुसार गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या भी काफी विदुषी और गुणवान होने के साथ काफी रूपवान भी थीं। देवताओं के राजा इंद्र देवी अहिल्या की खूबसूरती पर मोहित हो गए। एक दिन तड़के जब गौतम ऋषि नित्यक्रम और स्नान के लिए नदी की ओर निकले तो इंद्र गौतम ऋषि का वेष धारण कर कुटिया में प्रवेश कर गए और प्रणय निवेदन करने लगे। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में प्रणय निवेदन से उन्हें शक हुआ और जब उन्हें पता चल गया तो इंद्र को दुत्कार पर भगा दिया। लेकिन इंद्र के कुटिया से निकलने के क्रम में ही वहां गौतम ऋषि पहुंच गए।
क्रोधित ऋषि ने इंद्र को श्राप देने के साथ अहिल्या पर भी गंभीर आरोप लगाए। गौतम ऋषि के श्राप के कारण अहिल्या पत्थर बन गई। क्रोधित गौतम ऋषि तप करने हिमालय निकल गए। वर्षों बाद प्रभु श्रीराम ने अपने भाई लक्षण और गुरु विश्वामित्र के साथ मिथिला की राजधानी जनकपुर जाने के क्रम में उनका उद्धार किया। जब भगवान राम धनुष यज्ञ में शामिल होने जनकपुर जा रहे थे, तब रास्ते में उन्होंने गौतम ऋषि का आश्रम देखा। विश्वामित्र से जानकारी मिलने पर राम ने अहिल्या को देखा। विश्वामित्र ने बताया कि अहिल्या का उद्धार केवल राम के चरणों की धूल से ही संभव है। राम ने जैसे ही पत्थर को अपने चरणों की धूल से स्पर्श किया, अहिल्या अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गईं।
दरभंगा महाराज छत्र सिंह ने सन 1635 में यहां स्थित भव्य मंदिर बनवाया था।
माता अहिल्या के बगल में भगवान राम का है मंदिर
इसके बाद इस स्थान का नाम अहिल्यास्थान पड़ा। यहीं माता अहिल्या के नाम पर मंदिर बनाया गया। यह मंदिर आज भी एक मड़वा के रूप में है। बगल में भगवान राम का भव्य मंदिर बना है। अहिल्यास्थान मंदिर में आज भी माता अहिल्या की कोई मूर्ति नहीं है। यहां मिट्टी से बनी एक पीड़ी की पूजा होती है। अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां जरूर स्थापित हैं।
जानकारी के अनुसार दरभंगा महाराज छत्र सिंह ने सन 1635 में यहां स्थित भव्य मंदिर बनवाया था। इस मंदिर में प्रभु श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण के साथ हनुमान जी की भी मूर्तियां हैं। मंदिर में देवी अहिल्या और गौतम ऋषि की भी मूर्तियां हैं। बताया जाता है कि संत रामानुज से यहां एक स्तंभ और पिंड का निर्माण करवाया था। मंदिर के पास ही खिरोई नदी के तट पर गौतम ऋषि का आश्रम है। इसके आसपास कई अन्य ऋषि-मुनियों का आश्रम है।
अहिल्या स्थान दरभंगा शहर से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर अहियारी गांव में है। वैसे अब इस गांव को अहिल्यास्थान के नाम से ही लोग जानते हैं। यह कमतौल रेलवे स्टेशन से करीब 4 किलोमीटर दक्षिण में है। आप यहां टेकटार रेलवे स्टेशन उतर कर भी आ सकते हैं।माता सीता की जन्मस्थली पुनौराधाम सीतामढ़ी से यह करीब 40 किलोमीटर की दूरी पर है।
महिला पुजारी अवंतिका मिश्रा ने बताया कि यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा से निभाई जा रही है। स्थानीय पुजारी कामेश्वर मिश्रा ने कहा कि यह मंदिर आस्था और परंपरा का प्रतीक है।
पड़ोसी देश नेपाल से तो अन्य दिनों में भी लोग आते रहते हैं। माता अहिल्या का महिमा अपरमपार है।
पड़ोसी देश नेपाल से तो अन्य दिनों में भी लोग आते रहते हैं। माता अहिल्या का महिमा अपरमपार है।
न्यास समिति के सदस्य ने बताया कि यह मिथिला ही नही सम्पूर्ण भारत के दिव्य एवं अलौकिक जगह है। मिथिला में अहिल्यास्थान सनातन संस्कृति का एक धरोहर है।हिंदुओं के आस्था का केन्द्र बिंदु है। यहां अगड़ा-पिछड़ा, दलित-महादलित सभी सनातनी बनकर आकर श्रद्धा पूर्वक पूजा अर्चना कर रहे हैं। मेले में सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम किया गया है। सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं।
मान्यता को लेकर क्या कहते हैं भक्त
स्थानीय भक्त आलोक कुमार ने बताया कि मनुष्य के शरीर में अहिला होने पर माता अहिल्या को बैगन का भार चढ़ाया जाता है तब जाकर अहिला शरीर से खत्म होता है।बिना बैगन का भार चढ़ाए आप कितना भी दवा खा लीजिए नही ठीक होगा। उन्होंने बताया कि यहां हिन्दुस्तान के कोने-कोने से तो आते ही हैं, लेकिन अब विदेशों से भी लोग आने लगे हैं।
स्थानीय ललित ने अपने स्तर से श्रद्धालुओं के लिए शर्बत और प्रसाद का व्यवस्था कर रखा है। यहां दर्शन-पूजन करने वाले भक्तों को प्रसाद दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक यह काउंटर खुला रहेगा।
यहां तक कैसे पहुंचे?
दरभंगा देश के सभी प्रमुख शहरों से रेल, बस और वायु सेवा से जुड़ा हुआ है। दरभंगा से दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद,कोलकाता और अहमदाबाद के लिए नियमित उड़ान है। दरभंगा से आप ट्रेन से कमतौल फिर वहां से ऑटो से अहिल्यास्थान जा सकते हैं।आप दरभंगा से सड़क मार्ग से भी यहां पहुंच सकते हैं।





