Friday, May 1, 2026
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56 पकवानों का नहीं यहां मां के आठों स्वरुपों को लगाया गया 251 व्यंजनों का भोग।

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ग्रामीणों ने मिठाइयाँ, पकौड़े, खीर, फल आदि बनाए.
चैत्री नवरात्रि 2025 में विशेष भोग अर्पित किए गए.
मधुबनी : मिथिला का खानपान वैसे ही विश्व प्रसिद्ध है, लेकिन जब यहां कोई त्यौहार होता है या माता के विशेष रूप की पूजा होती है तो यहां पर भोग बहुत प्रसिद्ध है. वैसे तो मिथिला में 56 भोग प्रसाद हैं लेकिन मधुबनी के कलुआही प्रखंड स्थित दयाल पाली दुर्गा मंदिर पर जो 251 प्रकार व्यंजन का भोग लगा है जिसे देखकर आप भी हैरान हो जाएंगे.

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बिना तामसिक प्रसाद शायद ही मिथिला की तरह व्यंजन कहीं और लोग परोसते होंगे. लेकिन यहां विशेष तौर पर जब नवरात्र का समय आता है तब माता के भोग भी उस हिसाब से लगते हैं. बता दें कि मधुबनी मिथिला का केंद्र माना जाता है और यहां पर चैत्री नवरात्रि 2025 में 251 भोग माता को अष्टमी के रात में प्रसाद के रूप में अर्पित किया गया है.

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यह भोग ग्रामीणों के द्वारा ही बनाया गया है. यहां पर विशेष रूप शुद्ध और नए बर्तन में बना है. बता दें कि जिला की कलुआही प्रखंड के पाली गांव में 56 ही नहीं बल्कि 251 भोग विशेष रूप से लगाया गया है. यहां पर इतना विशेष भव्य तरीके से पूजा अर्चना की जाती है कि जिसकी चर्चा पूरे जिले में होती है.

बनाए गए कुछ यह विशेष भोग
ग्रामीणों द्वारा बनाए गए माता को अर्पित किए गए भोग के नाम भी जान लीजिए. यहां पर कम से कम तो 50 प्रकार की मिठाई जिसमें रसगुल्ला, गुलाब जामुन, काजू कतली, बर्फी, खोया, अलग-अलग मिठाई, बर्फी और आदि बनाए गए. साथ ही मालपुआ, पूरी, खजुरिया, मखाना, मिश्री, मखाना खीर, पकौड़े भी बहुत प्रकार के बनाए गए जैसे केला आलू या अलग प्रकार की सब्जियां, संतरा फल फ्रूट भी परोसे गए हैं, जिसमें विशेष रूप से 251 प्रकार के भोग लगाए गए.

इसमें तिलकोर के तरुआ भी मुख्य रूप से, साग मिथिला में बहुत ही प्रसिद्ध है जो कि यहां पर बनाया गया. इसके अलावा अलग-अलग भोग और ड्राई फ्रूट्स, सब्जी, पकौड़े, खीर, हलुआ, मिठाइयां और खामहाउर तरुआ, ओल आदि अर्पित किए.

 

कभी 56 तो कभी 101 पकवानों का लगता भोग
बहुत सालों से यहां पर चैत्र नवरात्रि धूमधाम से ग्रामीण द्वारा मनाया जाता है. और हर बार कुछ ना कुछ विशेष होता है, कभी छप्पन भोग कभी 101 हो लेकिन इस बार 251 भोग बनाए गए जो की एक चर्चा का विषय बना हुआ है. माता को यह प्रसाद के रूप में अर्पित करने के बाद ग्रामीणों को यह प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।

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