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आउटसोर्सिंग कर्मियों के भविष्य पर सरकार फिर से विचार करे।

मधुबनी में शिक्षा विभाग द्वारा आउटसोर्सिंग के तहत नियुक्त करीब 5,000 कर्मियों को 31 मार्च के बाद सेवा से मुक्त करने का निर्णय लिया गया है। इससे उनके भविष्य पर संकट आ गया है। इन कर्मियों ने शिक्षा और…

आउटसोर्सिंग कर्मियों के भविष्य पर सरकार फिर से विचार करे।

जिले में शिक्षा विभाग द्वारा आउटसोर्सिंग के माध्यम से नियुक्त लगभग 5,000 कर्मियों का भविष्य अनिश्चितता के दौर में गुजर रहा है। इन कर्मियों को 31 मार्च के बाद सेवा से मुक्त करने का निर्णय लिया गया है। फलत: उनकी नौकरियों पर संकट मंडरा रहा है।

 

तत्कालीन अपर मुख्य सचिव केके पाठक द्वारा शिक्षा विभाग के कार्यों में गति लाने, स्कूलों की प्रबंधन व्यवस्था को बेहतर बनाने, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने, बच्चों के कौशल विकास और तकनीकी ज्ञान बढ़ाने के लिए इन कर्मियों की नियुक्ति की गई थी। प्रखंड प्रोजेक्ट मैनेजर (बीपीएम) चंद्रमणि कुमार बताते हैं कि उनके तबादले के बाद, आउसोर्सिंग पर काम करनेवाले को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। उन्होंने बताया कि अब हम सभी को हटाने का आदेश जारी कर दिया गया है, इससे हजारों युवाओं का भविष्य अंधकारमय हो गया है। इन आउटसोर्सिंग कर्मियों में जिला कार्यक्रम प्रबंधक, प्रोग्रामर, बीपीएम, प्रखंड साधन सेवी (बीआरपी), एकाउंट सहायक, एमटीएस, आईसीटी लैब इंस्ट्रक्टर व अन्य पदों पर कार्यरत कर्मचारी शामिल हैं।

बीआरपी कुमारी प्रियंका बताती हैं कि ये सभी कर्मी शिक्षा और स्कूल प्रबंधन के साथ-साथ अन्य दो दर्जन कार्यों को बखूबी निभा रहे थे। मधुबनी जिले में केवल 12 प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी हैं, जबकि जिले में कुल 22 प्रखंड हैं।

 

 

सरकार के इस फैसले से जिले मेंे कर्मियों की भारी कमी हो जाएगी है। बीपीएम कमलेश कुमार का आरोप है कि आउटसोर्सिंग कर्मियों के हटने के बाद, पहले की तरह अधिकारी शिक्षकों को बिचौलियों के रूप में फिर से काम पर लगा देंगे। बीपीएम चंद्रकिशोर शर्मा कहते हैं कि सरकार हमें फिर से बेरोजगारी में धकेल दिया है। उन्होंने विभाग की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि युवाओं का भविष्य दांव पर लगा हुआ है। इस कारण विभाग को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए। बीपीएम रीतेश बताते हैं कि इस घटनाक्रम ने राज्य में शिक्षा व्यवस्था और रोजगार नीति पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया गया है। इससे सिर्फ मधुबनी जिले में पांच हजार से अधिक युवाओं का भविष्य अधर में लटक गया है।

शिक्षण के साथ प्रशासनिक कार्य भी : आउटसोर्सिंग कर्मियों ने शैक्षणिक कार्यों के अलावा दर्जनों कार्यों के निपटाने में मुख्य भूमिका निभाया है। इसके तहत डिजिटल उपस्थिति प्रबंधन, अपार आईडी, आधार कार्ड, कमांड एंड कंट्रोल, गणितीय मूल्यांकन, पीएमश्री योजना, सीआरसी समन्वयक, ई शिक्षा कोष, शिक्षा दरबार, मॉक टेस्ट, डीबीटी, यूडायस, शिक्षकों के दस्तावेज सत्यापन, जिला व राज्य प्रशासन के कार्यों को संपन्न किया है। इन कर्मियों का कहना है कि विद्यालय अनुश्रवण के अलावा दो दर्जन से अधिक कार्यों का निष्पादन किया जा रहा है, जो इनके हटने के बाद ये कार्य ठप हो जाएंगे। इसके बाद भी सरकार इन्हें हटाने का फरमान जारी कर दिया है। उन्होंने बताया कि उनकी नियुक्ति तीन साल के लिए हुई थी। साथ में यह भी तय था कि कार्यावधि ठीक ढंग से पूरा करने पर उन्हें फिर से काम पर रखा जा सकता है। बीआरपी फनिस कुमार बताते हैं कि इस काम में शामिल होने के बाद वे भविष्य के ताने-बाने बुनने लगे थे। पर,अब हम अंधेरे में हैं।

तीन साल का करारनामा, एक साल में ही किया खत्म

जिला प्रोग्राम मैनेजर (डीपीएम) सतीश कुमार ने बताया कि आउटसोर्सिंग कर्मियों की भूमिका स्कूलों में अत्यधिक महत्वपूर्ण रही है। बच्चों को तकनीकी शिक्षा देने से लेकर प्रशासनिक कार्यों में भी सहयोग करते रहे हैं। अचानक हटाने का फैसला तर्कसंगत नहीं है। तीन सालों के काररनामा को बढ़ाने की बजाए एक साल में ही हटाने का फरमान जारी कर दिया गया है।

 

अपने रोजी रोजगार को छोड़कर यहां पर शिक्षा विभाग के नाम पर हजारों युवा आ गये हैं और अब शिक्षा विभाग के नाम पर बदनामी हो रही है। हम सरकार से मांग करते हैं कि कर्मियों को किसी अन्य सरकारी परियोजना या संविदा पदों पर समायोजित किया जाए। एक ओर सरकार रोजगार का ढ़िढोरा पीट रही है और एक ओर युवाओं को सड़क पर लाने का काम कर रही है। इससे बिहार सरकार की बदनामी होगी।

रोजगार की सुरक्षा सुनिश्चित करे विभाग

बीपीएम शशिभूषण, प्रशांत, पुनित आदि ने कहा कि सरकार के इस फैसले से शिक्षा विभाग की लापरवाही उजागर हो रही है।

 

विभाग ने कार्ययोजना का निर्माण व अन्य कार्यों को पूरा करने में लापरवाही बरती है। युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जाता रहा है। पहले हटाने और फिर डीईओ को इन मानव बल के कार्यों की विस्तृत समीक्षा करने का निर्देश भ्रम की हालत पैदा कर रहा है। विभाग हमेशा से ही विभिन्न प्रयोग में ही शैक्षणिक व्यवस्था को चौपट कर रहा है। इन कर्मियों ने बताया कि उनमें से कई युवा उच्च शिक्षित हैं, जिन्होंने स्नातक और बीटेक जैसी डिग्रियां हासिल की हैं। अब उनकी नौकरियों पर तलवार लटक रही है। इन समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक है कि सरकार और संबंधित विभाग इन कर्मियों को गंभीरता से लें और उनके रोजगार की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम उठाएं।

स्थानीय स्तर पर संसाधन सीमित हैं। ऐसी परिस्थिति में कई कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं। आउटसोर्सिंग कर्मियों ने निश्चित रूप से शिक्षा व्यवस्था में योगदान दिया है, लेकिन अब विभाग को अन्य प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए कार्य करना होगा। विभाग इस मुद्दे पर विचार कर रहा है और जल्द ही कोई समाधान निकाला जाएगा। प्रयास होगा कि किसी भी कर्मी को अनावश्यक कठिनाई न हो और योग्य लोगों को रोजगार के अवसर मिलें। शिक्षा विभाग को आउटसोर्सिंग कर्मियों के कार्यों की समीक्षा कर रिपोर्ट भेजी जायेगी। उम्मीद है अच्छे फैसले लिए जाएंगे। -जावेद आलम, डीईओ

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