Sunday, May 3, 2026
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मारवाड़ी कॉलेज के संस्कृत विभाग द्वारा ‘भारतीय ज्ञान- परंपरा पर श्रीमद्भगवद्गीता का प्रभाव’ विषयक राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित।

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ऑनलाइन मोड में किया गया, जिसमें दिल्ली, असम, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, उड़ीसा, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, बिहार, पंजाब तथा उत्तर प्रदेश आदि के साथ ही मंगोलिया आदि देशों के 100 से अधिक प्रतिभागियों की सहभागिता हुई।

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प्रधानाचार्य डा दिलीप कुमार की अध्यक्षता में आयोजित उद्घाटन सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो ओम नाथ बिमली ने उद्घाटन वक्तव्य दिया, जबकि जेएनयू ,नई दिल्ली के संस्कृत एवं प्राच्य विद्या के प्राध्यापक प्रो सी उपेन्द्र राव ने बीज वक्तव्य

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दिया। वहीं मिथिला विश्वविद्यालय के संस्कृत- प्राध्यापक डा आर एन चौरसिया ने मुख्य अतिथि के रूप में मुख्य वक्तव्य दिया, जबकि इस्कॉन, शुभंकरपुर, दरभंगा के प्रबंधक लक्ष्मण कृपा दास ने विशिष्ट वक्तव्य दिया।

समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष एवं आयोजन सचिव डा सुनीता कुमारी के संचालन में आयोजित इस सत्र में अतिथि स्वागत एवं विषय प्रवर्तन संस्कृत विभागाध्यक्ष एवं संगोष्ठी- संयोजक डा विकास सिंह ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन कॉलेज के बर्सर डा अवधेश प्रसाद यादव ने किया।

सेमिनार में जीडी कॉलेज, बेगूसराय के डा शशिकांत पांडे, संस्कृत विश्वविद्यालय के डा नंदकिशोर ठाकुर, आरबीएस कॉलेज, अंदौर के डा राम नारायण राय, एम एस एस कॉलेज, सरिसवपाही के डा शकुंतला कुमारी, डॉ कविता, डा विनोद बैठा, पीजी से डा अंकित कुमार, डा अमित कुमार सिंह, डा अनिरुद्ध प्रसाद, डा गजेन्द्र भारद्वाज, गंगेश कुमार झा, डा रवि कुमार राम तथा डा हेमंत कुमार ठाकुर आदि सहित 100 से अधिक प्रतिभागी उपस्थित थे।

उद्घाटन वक्तव्य में प्रो ओमनाथ बिमली ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा सर्वोत्कृष्ट है जो मूलतः एक श्रुति परंपरा है, जिसका मूल वेद है। गीता भी वेदज्ञान को ही प्रतिपादित करती है, जिसमें भक्ति, कर्म और ज्ञान आदि का विशेष रूप से प्रतिपादन हुआ है। उन्होंने कहा कि गीताज्ञान समग्र है, जिसका भारतीय ज्ञान- परंपरा के सभी आयामों पर गहरा प्रभाव पड़ा है।

बीज वक्तव्य में प्रो सी उपेन्द्र राव ने सेमिनार के विषय को प्रासंगिक बताते हुए कहा कि गीता महोदधि है और गीताज्ञान आचरण का ज्ञान है। इसलिए हर अवस्था के व्यक्तियों को गीताज्ञान सतत प्राप्त करना चाहिए।

अध्यक्षीय संबोधन में प्रधानाचार्य डा दिलीप कुमार ने सेमिनार आयोजन को सफल बताते हुए आयोजकों को बधाई दी और कहा कि इस तरह के आयोजनों से युवा पीढ़ी में नई ऊर्जा तथा ज्ञान का प्रवाह होता है। उन्होंने कहा कि विपरीत स्थिति में भी गीताज्ञान हमें आगे बढ़ाने की प्रेरणा देता है। गीता में बहुत- सी ऐसी बातें वर्णित हैं जो हमारे जीवन को सफल एवं उपयोगी बनती हैं।

मुख्य अतिथि के रूप में डा आर एन चौरसिया ने कहा कि हजारों वर्षों के बाद भी गीता में वर्णित व्यावहारिक ज्ञान की प्रासंगिकता दिनानुदिन बढ़ती ही जा रही है।

गीता के 18 अध्यायों में वर्णित 700 श्लोकों का ज्ञान हमें बेहतरीन जीवन- प्रबंधन सिखाती है। संकट काल में भी गीताज्ञान हमारा श्रेष्ठ मार्गदर्शन करती है। उन्होंने कहा कि गीताज्ञान से ही मानव का वास्तविक कल्याण, मानवता की रक्षा होगी तथा भारत विश्वगुरु भी बन सकेगा। भारतीय ज्ञान परंपरा में गीता का सर्वाधिक महत्व एवं काफी प्रभाव है, जिसके अध्ययन एवं आचरण से किसी भी समस्या का निदान किया जा सकता है।

वहीं विषय प्रवर्तन करते हुए डा विकास सिंह ने सेमिनार के उद्देश्यों एवं महत्वों पर विस्तार से प्रकाश डाला और अतिथियों का स्वागत एवं प्रतिभागियों का परिचय कराया। उन्होंने बताया कि सेमिनार उद्घाटन एवं समापन सत्रों के साथ ही चार समानांतर तकनीकी सत्रों में संपादित होगी, जिसमें विभिन्न राज्यों एवं देशों के 100 से अधिक प्रतिभागी भाग ले रहे हैं, जिन्हें प्रमाण पत्र दिया जा रहा है। वहीं धन्यवाद ज्ञापन कॉलेज के बर्सर डा अवधेश प्रसाद यादव ने किया। अतिथियों का स्वागत चादर, फाइल एवं पैन पैड आदि से किया गया। सेमिनार का प्रारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन से हुआ, वहीं हरि कीर्तन इस्कॉन के सदस्यों द्वारा किया गया, जबकि संगोष्ठी का समापन राष्ट्रगान से हुआ।

संयोजक डा विकास सिंह ने बताया कि प्रथम तकनीकी सत्र डा विनोद बैठा की अध्यक्षता में हुई, जिसमें विशिष्ट वक्ता डा अंकित कुमार सिंह के अलावे 13 प्रतिभागियों ने पत्र वाचन किया, जबकि द्वितीय सत्र की अध्यक्षता डॉ शशिकांत पांडे ने की, जिसमें विशिष्ट वक्ता डॉ रितेश चतुर्वेदी ने की एवं 13 प्रतिभागियों ने पत्र वाचन किया। वहीं तृतीय सत्र की अध्यक्षता डा वरुण गुलाटी ने की, जबकि विशिष्ट वक्ता डा गोविंद शर्मा के अलावे 13 प्रतिभागियों में पत्र वाचन किया तथा चतुर्थ सत्र की अध्यक्षता प्रो चंदन भट्टाचार्य ने की, जिसमें विशिष्ट वक्ता डॉ धर्मेंद्र कुमार के अलावे 13 प्रतिभागियों ने पत्र वाचन किया।

प्रधानाचार्य डा दिलीप कुमार की अध्यक्षता में आयोजित समापन सत्र में पंजाब विश्वविद्यालय की प्रो रितु बाला मुख्य अतिथि, विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग के अध्यक्ष डा घनश्याम महतो सारस्वत अतिथि, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर, उत्तराखंड के डा सच्चिदानंद स्नेही विशिष्ट अतिथि के रूप में अपने वक्तव्य दिए। वहीं डॉ रवि कुमार राम के संचालन में आयोजित इस सत्र में अतिथियों का स्वागत डा अमित कुमार सिंह तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ विकास सिंह ने किया।

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