Saturday, May 2, 2026
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बिहार के राज्यपाल बोले- भारत में लोकतंत्र और असहमति हजारों साल से, लेकिन मर्यादा होनी चाहिए ।

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कार्यक्रम के दौरान आरिफ मोहम्मद खान

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जयपुर: बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान का कहना है कि बहुत सारे लोगों का मानना है कि देश में आजादी के बाद लोकतंत्र आया है, लेकिन भारत में लोकतंत्र 1947 में देश के आजाद होने के बाद नहीं आया है, बल्कि हजारों साल से है. खान ने कहा कि महात्मा बुद्ध से पहले आज के बिहार में वैशाली गणराज्य था, जो एक लोकतांत्रिक राज्य था. असहमति भी उससे पहले से है.

खान ने गुरुवार को जयपुर के कांस्टीट्यूशन क्लब में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की 98वीं जयंती के मौके पर आयोजित व्याख्यान माला को संबोधित करते हुए कहा कि उस समय कई अन्य राज्य भी थे, जहां पर जनता मताधिकार के जरिए राजा का चुनाव करती थी. उन्होंने कहा कि भारत राजनीतिक तौर पर टुकड़ों में बंटा हुआ था और सब जगह राजतंत्र था. इसके बावजूद भी हमारी संस्कृति में असहमति की पुरानी परंपरा है.

बिहार के राज्यपाल ने क्या कहा, सुनिए.
भरत ने भी जताई थी असहमति : आरिफ मोहम्मद खान ने रामायण का जिक्र करते हुए कहा कि भगवान राम के राजतिलक से पहले राजा दशरथ ने जो वचन अपनी छोटी रानी कैकेयी को दिए थे, उसके मुताबिक राम को वनवास जाना पड़ा और भरत को राजपाट मिला, लेकिन भरत ने अपने पिता दशरथ का आदेश नहीं माना और अपनी माता की इच्छा नहीं मानी. उन्होंने खुलकर असहमति व्यक्त की थी. भरत वनवास गए और भाई को लाने का प्रयास किया, लेकिन भाई नहीं आए तो उनकी पादुकाएं ही लेकर आ गए.

राज्यपाल ने कहा कि असहमति भी सभ्यता के दायरे में रहकर होनी चाहिए. कुछ लोग आपस में बैठकर चर्चा करते हैं तो उसमें कुछ लोग एक दूसरे की राय से सहमत नहीं होते हैं, लेकिन बाद में एक सही निष्कर्ष निकलकर सामने आता है. आरिफ मोहम्मद खान ने लोकतंत्र और स्मृति को लेकर भारतीय संस्कृति के प्राचीन ग्रंथों ऋग्वेद, यजुर्वेद, रामायण और महाभारत का भी उल्लेख किया.

 

चंद्रशेखर से थी मेरी भारी असहमति : आरिफ मोहम्मद खान ने पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ अपने रिश्तों को लेकर कहा कि मेरी उनसे भारी असहमति रहती थी. मैं मानता था जो लोग बंटवारे की राजनीतिक करते हैं, चंद्रशेखर उन्हें प्रोत्साहन देते हैं, लेकिन वास्तविकता यह थी कि उनका बड़ा दिल था. यह माना ही नहीं जा सकता था कि वो ऐसी किसी गतिविधि को प्रोत्साहन देंगे जो राष्ट्र को कमजोर करने वाली होगी. लेकिन वह ऐसे लोगों को भी बांधकर रखने की कोशिश करते थे, ताकि वह अपनी सीमाओं से बाहर नहीं जाएं. उन्होंने कहा कि चंद्रशेखर युवाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत रहे हैं. वो जीवन भर निर्बलों और नौजवानों के लिए संघर्ष करते रहे हैं.

चंद्रशेखर संघर्ष की पाठशाला :पूर्व नेता प्रतिपक्ष और भाजपा नेता राजेंद्र राठौड़ ने चंद्रशेखर को याद करते हुए कहा कि जब वे राजस्थान विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे, तब चंद्रशेखर उनके कार्यालय का उद्घाटन करने आए थे. उन्होंने चंद्रशेखर के साथ पद यात्रा भी की. राठौड़ ने कहा कि चंद्रशेखर ने कांग्रेस में रहते हुए आपातकाल का विरोध किया. उनका अखबार बंद हो गया और जेल चले गए.

राठौड़ ने कहा कि जब राजस्थान में जनता दल और जनता पार्टी की सरकार थी, तब मैं 1990 में पहली बार विधायक चुनकर आया था. भैरोंसिंह शेखावत मुख्यमंत्री थे, तब किन्हीं कारणों के चलते सरकार अल्पमत में आ गई थी और हम असमंजस में थे कि अपनी पार्टी का साथ दें या सरकार बचाने के लिए जाएं.

 

तब चंद्रशेखर ने कहा कि आप सरकार बचाइए और हम 26 विधायकों ने जनता दल से अलग होकर एक नया दल बनाया और सरकार को सपोर्ट किया. राठौड़ ने कहा कि आज देश में जितने भी राजनीतिक दल हैं और उनमें जो शीर्ष नेता हैं, उनमें बहुत सारे नेता ऐसे मिलेंगे, जिन्हें चंद्रशेखर ने तराशा था.

असहमति रखने वालों को दुश्मन माना जाता है : वरिष्ठ समाजवादी नेता और पूर्व सांसद पंडित रामकिशन शर्मा ने कहा असहमति के बिना लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती है, लेकिन आज लोकतंत्र में असहमति रखने वालों को दुश्मन माना जाता है. ऐसा नहीं होना चाहिए. उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब उसमें असहमति होगी. व्याख्यान माला को भाजपा विधायक गोपाल शर्मा और कार्यक्रम आयोजक लोकेश कुमार साहिल ने भी संबोधित करते हुए चंद्रशेखर की राजनीतिक यात्रा पर प्रकाश डाला.

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