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दरभंगा : खामोश हो गयी आकाशवाणी दरभंगा के खुरखुर भाई की आवाज, चनौर गांव में अंतिम सांस ली

खुरखुर भाई का जन्म वर्ष 1947 में 30 अक्टूबर को हुआ था। विगत करीब छह माह से वे अस्वस्थ चल रहे थे। गत एक सप्ताह से उनका इलाज दरभंगा के एक निजी अस्पताल में चल रहा था। यहां चिकित्सकों ने गत 11 अक्टूबर को परिजनों को उन्हें घर ले जाने की सलाह दी। 12 अक्टूबर की अहले सुबह उनका देहावसान हो गया।

खामोश हो गयी आकाशवाणी दरभंगा के खुरखुर भाई की आवाज, चनौर गांव में अंतिम सांस ली

आकाशवाणी दरभंगा के रेडियो नायक तथा ‘गाम-घर’ एवं ‘फुलवारी’ जैसे मैथिली कार्यक्रम की जानी-पहचानी आवाज सदा के लिए खामोश हो गयी। इंद्रानंद सिंह झा उर्फ खुरखुर भाई का देहावसान हो गया। शनिवार 12 अक्टूबर विजयादशमी को उन्होंने अपने पैतृक आवास मनीगाझी प्रखंड क्षेत्र के चनौर गांव में अंतिम सांस ली। लोग उन्हें ‘मिथिला के ‘अमीन सायानी’ के रूप में जानते थे। उनके निधन से पूरे मिथिला क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई है।

खुरखुर भाई का जन्म वर्ष 1947 में 30 अक्टूबर को हुआ था। विगत करीब छह माह से वे अस्वस्थ चल रहे थे। गत एक सप्ताह से उनका इलाज दरभंगा के एक निजी अस्पताल में चल रहा था। यहां चिकित्सकों ने गत 11 अक्टूबर को परिजनों को उन्हें घर ले जाने की सलाह दी। वहां से घर पहुंचते ही 12 अक्टूबर की अहले सुबह उनका देहावसान हो गया।

 

प्रारंभ से ही प्रतिभा के धनी रहे खुरखुर भाई ने मधुबनी जिले के सरिसबपाही गांव स्थित लक्ष्मीश्वर एकेडमी से मैट्रिक तथा सीएम कॉलेज, दरभंगा से आईएससी की डिग्री ली। इसके बाद मैथिली में स्नातक की डिग्री हासिल कर उन्होंने पटना से मैथिली भाषा में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। वर्ष 1975 में उन्होंने आकाशवाणी पटना में कैजुअल हिंदी के उद्घोषक तथा मैथिली कंपेयर पद पर सेवा की शुरुआत कर 36 वर्षों से अधिक की निरंतर सेवा करते हुए दरभंगा आकाशवाणी से सेवानिवृत्त हुए।

पटना आकाशवाणी में ‘चौपाल’ एवं ‘ खेती गृहस्थी’ कार्यक्रम तथा आकाशवाणी दरभंगा से ‘गाम-घर’ तथा ‘फुलवारी’ कार्यक्रम इनके बहुत रोचक तथा मनोरंजक कार्यक्रम हुआ करते थे। इनके प्रमुख प्रेरणास्रोत इनके अग्रज और आकाशवाणी पटना के छत्रानन्द सिंह झा उर्फ बटुक भाई थे।

प्रारंभिक जीवन से ही साहित्य एवं नाटक से लगाव रखने वाले खुरखुर भाई की कर्णप्रिय आवाज, कार्यक्रमों में विषय वस्तु का उपस्थापन तथा सहज एवं सरस शैली के साथ ही स्वाभाविक अभिव्यंजना चिरकाल तक अक्षुण्ण रहेगी। वे अपने पीछे पत्नी, एक पुत्र व दो पुत्रिययों सहित भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं।

छह भाइयों में बटुक भाई सहित अन्य दो भाइयों की मृत्यु पूर्व में ही हो गई है जबकि शेष तीन भाई विभिन्न सेवाओं से रिटायर होकर सुखी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उनके निधन की खबर पर किरण मैथिली साहित्य शोध संस्थान के सचिव डॉ. सतीरमण झा, इनके परम मित्र प्रो. भैरवेश्वर झा, डॉ. इन्द्रनाथ झा, आकाशवाणी दरभंगा के मणिकान्त झा, प्रो. केदारनाथ झा सहित अनेक गणमान्य शोक व्यक्त किया है।

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