Monday, July 6, 2026
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रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी पर व्याख्यान में ‘सीवी रमन की वैज्ञानिक विरासत एवं खाद्य प्रमाणीकरण की चुनौतियों’ पर हुई सार्थक चर्चा

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विश्वविद्यालय रसायन शास्त्र विभाग में ऑनलाइन विशिष्ट व्याख्यान कार्यक्रम आयोजित, बीएचयू, वाराणसी के डॉ वी रामनाथन

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ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के विश्वविद्यालय रसायनशास्त्र विभाग द्वारा संचालित रसायनशास्त्र व्याख्यानमाला के अंतर्गत “क्या रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी गौघृत के प्रमाणीकरण में हमारी सहायता कर सकती है?” विषय पर एक ऑनलाइन विशेषज्ञ व्याख्यान का सफल आयोजन किया गया। यह व्याख्यानमाला कुलपति प्रो संजय कुमार चौधरी की प्रेरणा से प्रारंभ की गई है तथा विभागाध्यक्ष प्रो दिलीप कुमार चौधरी के नेतृत्व में आयोजित की जा रही है। इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के रसायनशास्त्र विभाग के सह-प्राध्यापक एवं भारतीय ज्ञान प्रणाली उत्कृष्टता केन्द्र के अध्यक्ष डॉ वी. रमनाथन ने अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया।

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कार्यक्रम का शुभारंभ विश्वविद्यालय रसायनशास्त्र विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक प्रो संजय कुमार चौधरी के स्वागत उद्बोधन से हुआ। तत्पश्चात डॉ सोनू राम शंकर ने वक्ता का विस्तृत परिचय देते हुए रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी तथा भारतीय ज्ञान-परंपरा के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान से श्रोताओं को अवगत कराया।

अपने व्याख्यान में डॉ रमनाथन ने सी. वी. रमन के प्रारंभिक जीवन, वैज्ञानिक यात्रा तथा उनके महान वैज्ञानिक योगदान का अत्यंत रोचक वर्णन किया। उन्होंने कहा कि असाधारण वैज्ञानिक उपलब्धियाँ केवल प्रतिभा का परिणाम नहीं होतीं, बल्कि कठोर परिश्रम, उत्कृष्ट मार्गदर्शन तथा प्रेरणादायी संगति से भी संभव होती हैं। इस संदर्भ में उन्होंने आशुतोष डे का उदाहरण प्रस्तुत किया जो औपचारिक शिक्षा से लगभग वंचित होने के बावजूद अपनी अथक मेहनत तथा सी. वी. रमन के सान्निध्य के कारण अंतरराष्ट्रीय शोध-पत्रिकाओं में शोध-पत्र प्रकाशित करने में सफल हुए। उन्होंने के. एस. कृष्णन के योगदान का भी उल्लेख किया, जिन्होंने सी. वी. रमन के निर्देशन में शोधकार्य किया और आगे चलकर राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला के प्रथम निदेशक बने। डॉ रमनाथन ने यह भी बताया कि दरभंगा महाराज द्वारा उपलब्ध कराया गया उच्च गुणवत्ता का हीरा रमन के प्रयोगों में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ और रमन प्रभाव की खोज में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने इस प्रसंग के माध्यम से यह रेखांकित किया कि भारतीय राजाओं द्वारा विज्ञान को दिए गए संरक्षण ने देश की वैज्ञानिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

इसके उपरांत उन्होंने रमन प्रभाव के मूल सिद्धांतों को सरल एवं प्रभावी ढंग से समझाया तथा रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी की कार्यविधि, उसकी विशेषताओं और रसायन, पदार्थ विज्ञान, औषधि विश्लेषण तथा खाद्य परीक्षण सहित विभिन्न क्षेत्रों में उसके व्यापक अनुप्रयोगों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

अपने शोधकार्य का उल्लेख करते हुए डॉ रमनाथन ने गौघृत के प्रमाणीकरण में रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी के उपयोग पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि यद्यपि यह तकनीक तीव्र एवं अविनाशी विश्लेषण के लिए अत्यंत उपयोगी है, किन्तु वर्तमान स्वरूप में यह वास्तविक गौघृत तथा लार्ड एवं गाजर के अर्क से मिश्रित वनस्पति तेल से तैयार मिलावटी नमूनों के बीच विश्वसनीय अंतर स्थापित करने में सक्षम नहीं है। उन्होंने आग्रह किया कि किसी भी विश्लेषणात्मक तकनीक को मानक संचालन प्रक्रिया के रूप में अपनाने से पूर्व सरकारी एवं नियामक एजेंसियों को उसके व्यापक वैज्ञानिक प्रमाणीकरण तथा अन्य पूरक विश्लेषणात्मक विधियों के साथ उसके सत्यापन पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

व्याख्यान के उपरांत प्रश्नोत्तर सत्र में शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने सक्रिय सहभागिता करते हुए विषय से संबंधित अनेक जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया। इस अवसर पर विभाग के प्राध्यापक डॉ अभिषेक राय, डॉ अनिन्द्र शर्मा, डॉ मोनी शर्मा तथा डॉ मुकेश कुमार शर्मा भी उपस्थित रहे। एम.एससी. रसायनशास्त्र के द्वितीय एवं चतुर्थ सेमेस्टर के विद्यार्थियों ने भी बड़ी संख्या में व्याख्यान में सहभागिता की। यह व्याख्यान न केवल रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी के वैज्ञानिक आधार और उसके व्यावहारिक अनुप्रयोगों को समझने का उत्कृष्ट अवसर सिद्ध हुआ, बल्कि खाद्य प्रमाणीकरण में इसकी संभावनाओं और सीमाओं पर भी गंभीर चिंतन का माध्यम बना।

अपने व्याख्यान के समापन पर डॉ रमनाथन ने कहा कि सी. वी. रमन ने वर्ष 1928 में रमन प्रभाव की खोज की थी और अब इस ऐतिहासिक खोज की शताब्दी निकट है। उन्होंने स्मरण कराया कि इसी खोज की घोषणा की स्मृति में भारत प्रत्येक वर्ष 28 फ़रवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाता है। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी जानकारी के अनुसार रमन प्रभाव की खोज की शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित होने वाला यह देश का प्रथम शैक्षणिक कार्यक्रम है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इस प्रकार के आयोजन युवा विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करेंगे तथा उन्हें भारतीय वैज्ञानिक विरासत पर गर्व करने की प्रेरणा देंगे।

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