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विश्वविद्यालय मैथिली विभाग में ललित’ की 95 वीं जयंती मनाई गई

विश्वविद्यालय मैथिली विभाग में सोमवार को प्रख्यात मैथिली साहित्यकार एवं कथाकार ‘ललित’ की 95 वीं जयंती प्रो० अरुण कुमार कर्ण की अध्यक्षता में मनाई गई। इस अवसर पर एक विशेष विचार-गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें विभाग के प्राध्यापक, शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं ने ललित के साहित्यिक अवदानों को याद करते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर अपने-अपने विचार रखे।

अध्यक्षता करते हुए प्रो अरुण कुमार कर्ण ने कहा कि ललित साहित्य के ऐसे कलाकार थे, जिनकी रचनाएँ हमेशा याद किए जाएंगे । उनकी रचना में मार्क्स और फ्रायड दोनों का समन्वय स्थापित है। उन्होंने बल देते हुए कहा कि ललित ने मिथिला के ग्रामीण जीवन, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक यथार्थ का जो सजीव चित्रण अपनी रचनाओं में किया है, वह आज के शोधार्थियों और युवा लेखकों के लिए एक बड़ा प्रेरणास्रोत है।

पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो० दमन कुमार झा ने कहा कि राजमोहन झा ने मैथिली साहित्य के सिद्धहस्त कथाकार ललित के कथा साहित्य को आधुनिक कथा की श्रेणी में रखा है। इन्ही से मैथिली कथा साहित्य अपने ऊचाई को प्राप्त कर सकी। मैथिली कथा – उपन्यास साहित्य को दिशा दिखाने वाले ललित ही हैं। इन्ही से प्रेरित होकर राजकमल चौधरी और मायानन्द मिश्र मैथिली साहित्य की तरफ उन्मुख हुए और माइल स्टोन बन गए।

प्रो० अशोक कुमार मेहता ने अपने सम्बोधन में कहा कि भविष्य में ललित की शताब्दी वर्ष मनाया जाना चाहिए। आगे कहा कि विद्यार्थी को उनके जीवन से प्रेरणा लेने चाहिए। उन्होंने उनके कथा -उपन्यास साहित्य की बारीकीयों से सब को अवगत कराया। उन्होंने कहा कि इनके कथा उपन्यास पढ़ कर कोई मैथिली की मूलभूत अवश्यकता से परिचित हो सकता है, और आगे का रास्ता भी इन्होने बखूबी दिखाया है।

डा. अभिलाषा कुमारी ने कहा कि ललित साहित्य एक बार में समझ लेने की चीज नहीं है। समझने पर उसमें बार बार डुबकी लगाने की इच्छा जागृत होती है। लोगों को ललित साहित्य समझने के लिए डुबकी लगानी ही पड़ेगी। वहीं डॉ. सुरेश पासवान ने कहा कि ललित अपने रचना में महिला पात्रों को आवश्यकता के रूप में प्रयोग किये ना कि उपभोग के रूप में । वे अपने रचनामे विशुद्ध मैथिली और पात्रानुकुल भाषा का प्रयोग किये हैं।
गोष्ठी में उपस्थित शोधार्थियों ने ललित के कथा-शिल्प, उनकी भाषा-शैली और उनके पात्रों के मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर अपने शोधपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक मैथिली कथा-साहित्य को समृद्ध करने और उसे एक नई दिशा देने में ललित का योगदान अविस्मरणीय है। छात्र-छात्राओं ने भी वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उनके साहित्य की प्रासंगिकता पर परिचर्चा की।
इस सारगर्भित विचार-गोष्ठी के संयोजन का दायित्व डॉ. सुनीता कुमारी ने कुशलतापूर्वक निर्वहन किया । मंच संचालन राजनाथ पंडित ने किया। इस अवसर पर विभाग के शिक्षकगण, शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद थे ।

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