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रेणु–साहित्य में ग्रामीण संस्कृति’ विषयक संगोष्ठी हुई

महान कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु की जयंती के उपलक्ष्य में विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के तत्वावधान में आभासी माध्यम से ‘रेणु–साहित्य में ग्रामीण संस्कृति’ विषयक संगोष्ठी हुई, जिसमें लगभग सौ प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी समीर ने तथा धन्यवादज्ञापन शोधार्थी दुर्गानंद ठाकुर ने किया।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो.उमेश कुमार ने कहा कि रेणु जी ग्रामीण संस्कृति के सबसे बड़े संवाहक हैं। उनका साहित्य लोक संस्कृति का विश्वकोश है। आज से पचास साल–सौ साल बाद जब हम ग्रामीण संस्कृति के संदर्भों को तलाशेंगे तो अनिवार्यतः रेणु–साहित्य की ओर जाना होगा। ग्रामीण संस्कृति के चित्रण में उन्होंने यथार्थ को रोमांटिसाइज नहीं किया है बल्कि उसकी घनीभूत अभिव्यक्ति उन्होंने की है। मसलन उनके ‘परती परिकथा’ उपन्यास को ही लें। उसमें उन्होंने कोसी नदी और बाढ़ की विभीषिका को जिस तरह चित्रित किया है, उससे यथार्थ की क्षति नहीं होती, मानवीय जिजीविषा का दुर्लभ चित्र उभर कर सामने आता है। यह रेणु–साहित्य में वर्णित ग्रामीण संस्कृति के चित्रण की विशिष्टता है कि उसमें मानवीय जिजीविषा, आपसी प्रेम, सौहार्द जैसे तत्व हमेशा मौजूद रहते हैं!

वहीं सह–प्राचार्य डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद सुमन ने कहा कि रेणु का साहित्य ग्रामीण संस्कृति की धड़कन है। रेणु जी की आंचलिकता में ग्रामीण संस्कृति सन्निहित है। उनकी आंचलिकता में गहरी राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता का भावबोध है। इसलिए उनकी ग्रामीण संस्कृति में पूरे देश और दुनिया के गांवों की पीड़ा, संघर्ष और जिजीविषा प्रतिबिंबित होती है। उनकी भाषा में जो संगीतात्मकता है, रागात्मकता है, उसका स्रोत ग्रामीण और आंचलिक जीवन ही है। ग्रामीण संस्कृति को चित्रित करते हुए उनकी नजर बराबर हजारों साल पुरानी वर्णवादी व्यवस्था पर बनी रही, जिसका उन्होंने अपनी रचनाओं में जबरदस्त क्रिटिक भी रचा। रेणु की ग्रामीण चेतना प्रगतिशील मूल्यों से अनुप्राणित है।

विभागीय सहायक प्राध्यापिका डॉ.मंजरी खरे ने कहा कि रेणु ने आंचलिकता के माध्यम से वैश्विकता को स्पर्श किया है। उनके साहित्य में लोक कलाओं का विस्तृत चित्रण मिलता है, जिससे हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझ सकते हैं। रेणु ने हमेशा लोक कलाओं को महज उत्पाद बनाने की दृष्टि का विरोध किया है। रेणु–साहित्य की प्रासंगिकता हमेशा समाज में बनी रहेगी।

मौके पर कई महाविद्यालयों के प्राध्यापकगण तथा शोधार्थी खुशबू कुमारी, सूफिया खातून,निशा कुमारी, रूपक कुमार, मलय नीरव, बबीता कुमारी, स्नेहा, विद्यासागर ठाकुर, दर्शन, अंशु कुमारी, कंचन रजक, जय प्रकाश, रोहित कुमार पटेल, अमित कुमार, संध्या राय, अपर्णा कुमारी, मालविका, बेबी कुमारी, रूबी कुमारी, धीरज कुमार, मिल्टन, स्नेहा, मोहक आदि कार्यक्रम से जुड़े थे तथा इन्होंने अपनी बातें रखीं।

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