बिहार का यह डॉक्टर बिना दवा के करता है दर्द का इलाज, फ्री इलाज के लिए इस दिन करें संपर्क ।
200 से अधिक निशुल्क कैंप: खास बात यह है कि डॉक्टर रजनीश आर्थिक रूप से कमजोर लोगों से वे कोई शुल्क नहीं लेते हैं. इस अभियान के जरिए डॉक्टर का लक्ष्य है बिहार को दर्द से मुक्त करना और लोगों को सही जीवनशैली के प्रति जागरूक करना. इस अवसर पर उन्होंने ईटीवी भारत से विशेष बातचीत में बताया कि अगले एक साल में 200 से अधिक निशुल्क कैंप आयोजित किए जाएंगे. इन कैंपों में कायरोपैथी विधा से लोगों का दर्द दूर किया जाएगा और उन्हें सही जीवनशैली के बारे में जागरूक भी किया जाएगा.
गलत पोस्चर है दर्द की असली वजह: डॉ. कांत ने बताया कि अधिकतर लोगों की दर्द से जुड़ी समस्याएं गलत पोस्चर यानी बैठने, खड़े होने और चलने के तरीके के कारण होती है. समय रहते इस पर ध्यान न देने से समस्या गंभीर हो जाती है और मानसिक तनाव भी बढ़ता है. उनका मानना है कि यदि सही समय पर दर्द का इलाज कर दिया जाए तो लोग न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी स्वस्थ रह सकते हैं.
दर्द से जूझ रहा हर घर:डॉ रजनीश कांत ने कहा कि आज बिहार का शायद ही कोई घर ऐसा होगा, जहां दर्द की समस्या न हो. लोग पेन किलर गोलियों का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन इनसे अस्थायी राहत तो मिलती है, पर लीवर और अन्य अंगों पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ते हैं. ऐसे में जरूरी है कि लोगों को बताया जाए कि दर्द से बचने के क्या उपाय हैं और बिना दवाओं के इसका इलाज किस तरह संभव है.
एलाइनमेंट के इलाज की शक्ति
रीढ़ की हड्डी पर असर: डॉ. कांत ने समझाया कि गलत चलना, बैठना और सोना हमारी रीढ़ की हड्डियों पर गहरा असर डालता है. इससे नस दबने की समस्या हो जाती है, जिसका नतीजा सिर दर्द, चक्कर आना, हाथ-पैर सुन्न होना, और यहां तक कि मधुमेह जैसी समस्याओं के रूप में सामने आता है. उन्होंने दावा किया कि अब तक उनकी टीम ने एक लाख से ज्यादा मरीजों का सफल उपचार किया है. हर महीने आयोजित कैंपों में सैकड़ों लोग लाभान्वित हो रहे हैं.
कायरोप्रैक्टिक थेरेपी से इलाज
प्राचीन परंपरा से जुड़ी विधा: डॉ रजनीश कांत ने स्पष्ट किया कि उनकी उपचार पद्धति कोई नया आविष्कार नहीं बल्कि बिहार की प्राचीन परंपरा से जुड़ी हुई है. द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कुबजा को सीधा करने का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि विदेशी शोधकर्ताओं ने 1895 से इस पद्धति पर काम करना शुरू किया था. आज अमेरिका जैसे देशों में इसे वैज्ञानिक मान्यता मिल चुकी है. लेकिन दुख की बात है कि बिहार में अब तक इस विषय की संस्थागत शिक्षा या कॉलेज मौजूद नहीं है.
भ्रांतियों का जवाब: डॉ. रजनीश कांत ने कहा कि उनके वीडियो और काम को लेकर कई तरह की भ्रांतियां फैलाई जाती हैं. उन्होंने साफ किया कि उनका उपचार पुरुष, महिला, बच्चे और बुजुर्ग सभी के लिए समान है. यह धारणा बिल्कुल गलत है कि वे सिर्फ महिलाओं को ही उपचारित करते हैं. उन्होंने दृढ़ता से कहा कि “डॉक्टर का टच कभी बैड टच नहीं होता” और उनका एकमात्र उद्देश्य मरीज की पीड़ा को दूर करना है.
बच्चों में बढ़ रही सर्वाइकल समस्या: डॉ. रजनीश कांत ने चिंता जताई कि आजकल छोटे बच्चे भी मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल के कारण सर्वाइकल की समस्या से जूझ रहे हैं. बच्चे लगातार मोबाइल स्क्रीन देखने के कारण गर्दन झुका कर बैठते हैं, जिससे रीढ़ की हड्डी पर दबाव बढ़ता है. उन्होंने सलाह दी कि बच्चे और वयस्क दोनों मोबाइल इस्तेमाल करते समय अपने पोश्चर पर ध्यान दें. ऐसा करने से गर्दन और पीठ दर्द की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है.
सेलिब्रिटी से आम जनता तक: डॉ. कांत ने बताया कि बड़े-बड़े सेलिब्रिटी पहले से ही उनकी सेवाएं ले चुके हैं, लेकिन अब उनका पूरा फोकस आम जनता पर है. आर्थिक रूप से कमजोर लोग भी इस उपचार का लाभ उठा सकें, इसलिए वे लगातार निशुल्क हेल्थ कैंप आयोजित करते हैं. उन्होंने कहा कि उनकी टीम सिर्फ जोड़ों और रीढ़ की हड्डी के दर्द ही नहीं बल्कि मानसिक संतुलन, गैस, एसिडिटी, चक्कर और अन्य सामान्य बीमारियों का भी इलाज करती है.
मशहूर कायरोप्रैक्टर डॉ. रजनीश कांत
कायरोपैथी क्या है?: कायरोपैथी दर्द के इलाज की एक वैकल्पिक उपचार पद्धति है. इसमें रीढ़ की हड्डी, नसों और हड्डियों के जोड़ को सही स्थिति में लाकर शरीर की समस्याओं का इलाज किया जाता है. इसमें दवा या सर्जरी का इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि डॉक्टर (कायरोप्रैक्टर) अपने हाथों से स्पाइन को अलाइनमेंट करके नसों पर पड़ने वाले दबाव को कम करते हैं. इससे दर्द से राहत मिलती है और शरीर हल्का महसूस होता है.
कायरोपैथी का मूल सिद्धांत: डॉ रजनीश कांत ने बताया कि शरीर की अधिकांश समस्याएं रीढ़ की हड्डी के असंतुलन ( स्पाइन मिसअलाइनमेंट) से उत्पन्न होती हैं. जब रीढ़ की हड्डी या जोड़ अपनी जगह से थोड़ा हट जाते हैं तो नसों पर दबाव पड़ता है. नसों पर दबाव के कारण दर्द, सिरदर्द, चक्कर, सुन्नपन, मांसपेशियों में तनाव, और यहां तक कि पाचन या नींद की समस्याएं भी हो सकती हैं. सही “ स्पाइन अलाइनमेंट” कर देने से नसों पर दबाव हट जाता है और शरीर प्राकृतिक रूप से खुद को ठीक करने लगता है.
कौन हैं डॉ रजनीश कांत?:पटना के मशहूर कायरोप्रैक्टर डॉ. रजनीश कांत आज बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश में अपनी खास पहचान बना चुके हैं. भोजपुर जिले के आरा निवासी डॉ. कांत ने फिजियोथेरेपी, ऑस्टियोपैथी और कायरोप्रैक्टिक में विशेष प्रशिक्षण हासिल किया और आज उनकी पहचान “दर्द मुक्त जीवन” देने वाले डॉक्टर के रूप में होती है. पटना और मुंबई में उनके क्लिनिक चल रहे हैं, जहां हजारों मरीज लाभान्वित हो चुके हैं. कई सेलिब्रिटी भी उनके इलाज से लाभान्वित हो चुके हैं.
मिल चुका है कई सम्मान: डॉ. कांत को अब तक कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं. उन्हें एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स और वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, लंदन से सम्मानित किया गया है. उनकी खास पहल यह है कि वे हर महीने की पहली तारीख को सौ से अधिक मरीजों का निशुल्क इलाज करते हैं. उनका कहना है कि यह पद्धति कोई नया आविष्कार नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय चिकित्सा परंपरा का हिस्सा है, जिसे आधुनिक विज्ञान ने मान्यता दी है.
कई सेलिब्रिटी का कर चुके हैं इलाज: उनकी ख्याति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने कई नामी हस्तियों का इलाज किया है. इनमें राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, केंद्रीय नेता उपेंद्र कुशवाहा, बॉलीवुड अभिनेता पंकज त्रिपाठी, भोजपुरी अभिनेत्री काजल राघवानी, अभिनेता व सांसद मनोज तिवारी जैसे कई सेलिब्रिटी शामिल हैं. आम जनता के बीच भी उनका “दर्द मुक्त बिहार” का अभियान शुरू हो रहा है जिसका मकसद है कि बिना दवाइयां के लोगों को दर्द से निजात मिले.
लालू यादव के साथ मशहूर कायरोप्रैक्टर डॉ. रजनीश कांत
सही चलना-बैठना ही है असली इलाज:डॉ. कांत का मानना है कि शरीर के सही संतुलन और स्पाइन एलाइनमेंट के जरिये कई बीमारियों से बचा जा सकता है. सही बैठना, चलना और सोना ही असली दवा है, जिसे लोग नजरअंदाज करते हैं. उन्होंने कहा कि कायरोपैथी सिर्फ शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक संतुलन को भी बेहतर बनाती है और लोगों को बिना दवा के स्वस्थ जीवन जीने की प्रेरणा देती है.
“मेरी सबसे बड़ी चाहत यही है कि न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे देश और दुनिया में “दर्द मुक्त समाज” का निर्माण हो. ऐसा समाज जहां लोग महंगी दवाओं और उपचार पर निर्भर न होकर प्राकृतिक और वैज्ञानिक तरीके से स्वस्थ रह सकें. उन्होंने कहा कि यह तभी संभव है जब हर नागरिक इस अभियान में सकारात्मक भागीदारी निभाए.”–डॉ. रजनीश कांत, कायरोप्रैक्टर
