सिंहासन खाली करो कि जनता आती है”, एलएनएमयू में गूंजे लोकनायक जेपी के विचार

लनामिवि, दरभंगा के विश्वविद्यालय राजनीति विज्ञान विभाग में विशेष व्याख्यान आयोजित
दरभंगा, 10 अक्टूबर “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” और “युवा बचाओ अपना देश” जैसे क्रांति के अमर नारों के साथ ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर राजनीति विज्ञान विभाग के कौटिल्य कक्ष में शनिवार को लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती की पूर्व संध्या पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। व्याख्यान का मुख्य विषय “Remembering JP Today” रहा। कार्यक्रम की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष डॉ अनिल कुमार चौधरी ने की, जबकि बी. आर. ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो अनिल कुमार ओझा मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे।

कार्यक्रम की शुरुआत लोकनायक जयप्रकाश नारायण के चित्र पर पुष्पांजलि, दीप प्रज्वलन और स्वागत गीत के साथ हुई। अतिथियों का सम्मान पाग, चादर एवं पुष्पगुच्छ भेंट कर किया गया। मंच संचालन शोधार्थी नितेश नायक ने किया। स्वागत भाषण प्रस्तुत करते हुए डॉ मनोज कुमार ने जेपी के 124वें जयंती वर्ष पर उन्हें नमन किया और अतिथियों का स्वागत किया।
कार्यक्रम में विषय प्रवेश कराते हुए पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो मुनेश्वर यादव ने जर्मन नाटककार बर्तोल्त ब्रेख्त के विचारों का हवाला देते हुए कहा कि जो समाज में वास्तविक परिवर्तन लाए, वही क्रांति है। उन्होंने जेपी के दार्शनिक चिंतन और गतिशीलता (Dynamics of His Philosophy) को रेखांकित करते हुए कहा कि “गतिशीलता ही जीवन है और ठहराव मृत्यु”। उन्होंने बताया कि जेपी जब अमेरिका में थे, तभी मार्क्सवाद से उनका गहरा परिचय हुआ और उनके चिंतन के केन्द्र में हमेशा गरीब, शोषित और हाशिए पर खड़े लोग रहे।
मुख्य वक्ता प्रो अनिल कुमार ओझा ने जेपी के जन्म से लेकर उनके संपूर्ण जीवन-दर्शन को सिलसिलेवार ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने जेपी के जन्म स्थान सिताब दियारा (जयप्रकाश नगर) से लेकर प्रारंभिक शिक्षा और अमेरिका में उनके उच्च शिक्षा के संघर्षों की विस्तृत चर्चा की। उन्होंने बताया कि अमेरिका में समाजशास्त्र (Sociology) के अध्ययन के दौरान जेपी मार्क्स, लेनिन और ट्रॉट्स्की के विचारों से गहराई से जुड़े और मनुष्यों के बीच समानता के मार्क्सवादी सिद्धांत से प्रभावित हुए। उनकी पत्नी प्रभावती देवी द्वारा साबरमती आश्रम में ब्रह्मचर्य का संकल्प लेने तथा 1929 में जेपी के भारत लौटने पर पंडित जवाहरलाल नेहरु के संपर्क में आकर कांग्रेस से जुड़ने व 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन पर उन्होंने विस्तार से बात रखी।

स्वतंत्रता संग्राम का उल्लेख करते हुए प्रो ओझा ने बताया कि 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान हजारीबाग सेन्ट्रल जेल में दिवाली के दिन योजना बनाकर जेपी का साथियों सहित दीवार फांदकर निकलना और ‘आजाद दस्ता’ का गठन करना स्वाधीनता इतिहास का एक बड़ा मोड़ था। लाहौर जेल में जेपी को दी गई कठोर प्रताड़ना की तुलना सावरकर की यातनाओं से करते हुए उन्होंने स्मरण कराया कि जेल से छूटकर जब जेपी पटना पहुंचे, तब राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने गांधी मैदान में उनके स्वागत में “तुम भारत के भाग्य विधाता” कविता पढ़ी थी। इसके साथ ही उन्होंने 1948 में संपत्ति के समान वितरण के समाजवादी एजेंडे और 1952 में नेहरु द्वारा कांग्रेस में शामिल होने के प्रस्ताव पर जेपी द्वारा रखी गई 14-सूत्रीय मांगों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी समझाई।
प्रो ओझा ने आगे बताया कि समाजवाद के दौर के बाद जेपी गांधीवादी सर्वोदय और विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से प्रेरित होकर पूरी तरह लोक-कल्याण के लिए समर्पित हो गए। उन्होंने रेखांकित किया कि जेपी के पास कोई राजकीय सत्ता नहीं थी, बल्कि उनकी असली ताकत उनकी अद्वितीय ‘नैतिक शक्ति’ थी। जेपी का स्पष्ट मानना था कि यदि समाज में गरीबी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार बढ़ता है तो फिर से बड़े बदलाव की जरूरत आन पड़ती है। उनका अंतिम लक्ष्य मानव मात्र की मुक्ति और मानवीय गरिमा की रक्षा करना था। जेपी किसी रूढ़िवादिता या ठहराव में बंधे नेता नहीं थे, इसलिए समकालीन राष्ट्रीय चुनौतियों को समझने में उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
सामाजिक विज्ञान के संकायाध्यक्ष प्रो ध्रुव कुमार मित्र ने जेपी आंदोलन के दौरान के अपने संस्मरण साझा करते हुए 1975 के आपातकाल के विरोध में जेपी के नेतृत्व में चले जनांदोलन और उस दौर के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य पर विस्तार से प्रकाश डाला।
अध्यक्षीय संबोधन में विभागाध्यक्ष डॉ अनिल कुमार चौधरी ने जेपी के अमेरिका प्रवास के दौरान लिखे गए प्रसिद्ध शोध पत्र “Cultural Variation” का उल्लेख करते हुए कहा कि जब व्यक्ति किसी काम को पूर्ण तन्मयता से करता है, तभी वह युगांतकारी बनता है। उन्होंने कहा कि मार्क्सवाद से लेकर गांधीवादी सोच, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और अंततः विनोबा भावे के सर्वोदय तक के सफर में जेपी ने जीवनपर्यंत नैतिकता को सर्वोपरि रखा।

इस अवसर पर पूर्व में आयोजित भाषण, निबंध एवं क्विज प्रतियोगिता के सफल प्रतिभागियों को पुस्तक और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। अंत में डॉ रघुवीर रंजन द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में डॉ प्रभात दास फाउंडेशन के मुकेश कुमार, विभागीय शिक्षक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
