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आरसी प्रसाद सिंह की कविताएं हमें प्रकृति के संरक्षण और उसके प्रति संवेदनशील होने की प्रेरणा देता है : प्रो दमन

विश्वविद्यालय मैथिली विभाग में प्रकृति और राष्ट्र चेतना के महाकवि आरसी प्रसाद सिंह की जयंती पर विचारगोष्ठी आयोजित
विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में प्रकृति के अप्रतिम कवि, साहित्य आकदेमी से सम्मानित आरसी प्रसाद सिंह की 116 जयंती मनाई गई। इस अवसर पर एक परिचर्चा आयोजित की गई, जिसका विषय “प्रकृति के कवि : आरसी प्रसाद सिंह” था। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो दमन कुमार झा ने की।

इस अवसर पर वक्ताओं ने आरसी प्रसाद सिंह के साहित्यिक अवदान पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए उन्हें मैथिली साहित्य का युगद्रष्टा बताया। उनकी रचनाओं में मातृभाषा के प्रति प्रेम, प्रकृति के प्रति प्रेम, मानवता, राष्ट्रभक्ति और दार्शनिक चिंतन का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।


अपने अध्यक्षीय संबोधन में पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो दमन कुमार झा ने कहा कि आरसी प्रसाद सिंह प्रकृति के कवि हैं। उनकी कविता में “प्रेम और प्रकृति शाश्वत हैं। जब-जब प्रकृति की चर्चा होगी, आरसी प्रसाद सिंह को अवश्य याद किया जाएगा। प्रकृति अमर है और जो प्रकृति की उपासना करता है, वह भी अपने कार्यों और विचारों के माध्यम से अमर हो जाता है। जिस प्रकृति ने हमें जीवन दिया है, आज दुर्भाग्यवश मनुष्य उसी के विनाश में लगा हुआ है। ऐसे समय में आरसी प्रसाद सिंह का साहित्य हमें प्रकृति के संरक्षण और उसके प्रति संवेदनशील बनने की प्रेरणा देता है।”

डॉ सुरेश पासवान ने कहा कि आरसी बाबू हिन्दी- मैथिली के निस्सन कवि थे। उनकी मैथिली कविताएं प्रकृति के नजदीक है। वे प्रकृति को अंगीकार कर लिए थे। उन्होंने कहा कि आरसी बाबू ने स्वीकारा है कि फूल से मुझे अत्यधिक लगाव है। इसीलिए उन्होंने अपनी कविता संग्रह का नाम सूर्यमुखी, पूजाक फूल और माटिक दीप रखा। उनमे प्रकृति प्रेम कूट कूट कर भरा हुआ था।
कार्यक्रम में वक्ता के रूप में निक्कू कुमार, नरेश पंडित, देवानंद यादव, आकृति झा एवं मनोज कुमार पंडित ने उनके प्रसिद्ध मैथिली काव्य ‘पूजाक फूल’, ‘माटिक दीप’ और ‘सूर्यमुखी’ पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि इन कृतियों में कवि ने फूलों, वृक्षों और प्राकृतिक उपादानों के माध्यम से जीवन के गूढ़ सत्य, सौंदर्यबोध तथा आध्यात्मिक चेतना को अभिव्यक्ति दी है। ‘सूर्यमुखी’ में प्रकृति और समर्पण का अद्वितीय चित्रण मिलता है। सभी ने एक मत से स्वीकार किया कि आरसी प्रसाद सिंह की साहित्य साधना आज भी नई पीढ़ी को प्रकृति, संस्कृति और मानवीय मूल्यों से जोड़ने का अद्भुत कार्य कर रही है।

कार्यक्रम में शीला कुमारी, नेहा कुमारी, मिथिलेश कुमार सहनी, मनोज कुमार, राजू कुमार शर्मा, राजनाथ पंडित, मनीष कुमार, पूजा कुमारी, रानी कुमारी, नीलू कुमारी, गुड़िया कुमारी, राजू कुमार, भवेश कुमार सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी एवं छात्र-छात्राओं के साथ विभागीय कर्मचारी नीरेन्द्र कुमार उपस्थित थे।
डॉ सुरेश पासवान के संचालन में आयोजित इस कार्यक्रम को डॉ सुनीता कुमारी के धन्यवाद ज्ञापन से सम्पन्न किया गया।

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