सामाजिक परिवर्तन और राजनीतिक प्रक्रियाएं एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं- डॉ एम. एस. वर्मा
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के विश्वविद्यालय राजनीति विज्ञान विभाग तथा डॉ प्रभात दास फाउंडेशन, दरभंगा के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारत में बदलती सामाजिक संरचना और राजनीतिक संस्कृति के नए आयाम’ विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। विभाग के कौटिल्य कक्ष में आयोजित इस अकादमिक कार्यक्रम में विभाग के पूर्व प्राध्यापक प्रो एम. एस. वर्मा मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो मुनेश्वर यादव ने विषय- प्रवेश कराते हुए बदलती सामाजिक संरचना और राजनीतिक संस्कृति के परस्पर संबंधों तथा समकालीन भारतीय समाज में इनकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने विषय की अकादमिक पृष्ठभूमि को रेखांकित करते हुए विद्यार्थियों को सामाजिक एवं राजनीतिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने की आवश्यकता बताई।
मुख्य वक्ता प्रो एम. एस. वर्मा ने अपने व्याख्यान में सामाजिक संरचना और राजनीति के अंतर्संबंधों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि राजनीति कभी भी समाज से अलग होकर शून्य में संचालित नहीं होती, बल्कि सामाजिक संरचना और राजनीतिक प्रक्रियाएं एक-दूसरे की पूरक एवं परस्पर निर्भर होती हैं। अपने 32 वर्षों के दीर्घ शैक्षणिक अनुभव के संदर्भ में उन्होंने स्वतंत्रता के बाद भारतीय समाज में आए महत्वपूर्ण परिवर्तनों की चर्चा की।
डॉ वर्मा ने बताया कि जमींदारी उन्मूलन जैसे राजनीतिक निर्णयों एवं कानूनी सुधारों ने भारतीय समाज की पारंपरिक संरचना में परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीतिक निर्णय केवल शासन-व्यवस्था को प्रभावित नहीं करते, बल्कि उनका प्रभाव समाज की संरचना और सामाजिक संबंधों पर भी पड़ता है।
भारतीय समाज में जाति की भूमिका पर चर्चा करते हुए उन्होंने प्रख्यात राजनीतिक चिंतक रजनी कोठारी के विचारों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज और राजनीति को समझने में जाति एक महत्वपूर्ण सामाजिक इकाई रही है, हालांकि शिक्षा के विस्तार, आर्थिक अवसरों में वृद्धि और सामाजिक गतिशीलता के कारण पारंपरिक सामाजिक स्थिति एवं संबंधों में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। उन्होंने परिवार की बदलती संरचना, महिलाओं की बढ़ती आत्मनिर्भरता, आधुनिकीकरण तथा सामाजिक परिवर्तन जैसे विभिन्न पहलुओं पर भी विस्तार से चर्चा की। राजनीतिक संस्कृति के संदर्भ में उन्होंने गेब्रियल आलमंड और सिडनी वर्बा की ‘सिविक कल्चर’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए राजनीतिक चेतना, नागरिक दृष्टिकोण और लोकतांत्रिक भागीदारी के महत्व को रेखांकित किया।कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्रभावशीलता केवल संस्थाओं पर निर्भर नहीं करती, बल्कि नागरिकों की राजनीतिक चेतना और सक्रिय सहभागिता भी उसकी महत्वपूर्ण आधारशिला है।
अध्यक्षीय संबोधन में विभागाध्यक्ष डॉ अनिल कुमार चौधरी ने सामाजिक परिवर्तन के विभिन्न स्वरूपों पर चर्चा की। उन्होंने क्रमिक विकास और क्रांति के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को समझाते हुए भारतीय समाज के ऐतिहासिक रूपांतरण का उल्लेख किया। उन्होंने सती प्रथा और बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों से लेकर आधुनिक लोकतांत्रिक समाज तक के विकास की चर्चा करते हुए सामाजिक परिवर्तन में कानून, सामाजिक चेतना और राजनीतिक प्रक्रियाओं की भूमिका को रेखांकित किया।
कार्यक्रम के दौरान व्याख्यान से जुड़े विभिन्न अकादमिक बिन्दुओं पर विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के बीच विचार-विमर्श हुआ। इससे विद्यार्थियों को भारतीय समाज में हो रहे सामाजिक परिवर्तनों तथा उनके राजनीतिक प्रभावों को सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों दृष्टियों से समझने का अवसर मिला।
कार्यक्रम के अंत में डॉ रघुवीर रंजन ने मुख्य वक्ता, डॉ प्रभात दास फाउंडेशन के सदस्यों, विभागीय एवं पूर्व प्राध्यापकों, शोधार्थियों तथा छात्र-छात्राओं के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर विभाग के शिक्षक डॉ मनोज कुमार, डॉ उमाकांत पासवान, डॉ नीतू कुमारी, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में स्नातकोत्तर विद्यार्थी उपस्थित रहे।