अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस पर विश्वविद्यालय अंग्रेज़ी विभाग द्वारा राष्ट्रीय वेबिनार आयोजित


अनुवाद केवल भाषाई प्रक्रिया नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना और अस्मिता के निर्माण का सशक्त माध्यम
अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस के अवसर पर ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के विश्वविद्यालय अंग्रेज़ी विभाग द्वारा एक राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। वेबिनार में देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षण संस्थानों से जुड़े विद्वानों ने अनुवाद की ऐतिहासिक परंपरा, उसके विविध स्वरूपों, वैश्वीकरण के दौर में उसकी प्रासंगिकता तथा भाषा, साहित्य, संस्कृति, राजनीति और स्मिता के साथ उसके गहरे अंतर्संबंधों पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में लगभग एक सौ प्रतिभागियों एवं छात्र-छात्राओं ने सहभागिता की।

कार्यक्रम के प्रथम प्रमुख वक्ता प्रो एम. आर. वर्मा, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार, उत्तराखंड ने अनुवाद की सुदीर्घ परंपरा, उसके इतिहास तथा विभिन्न आयामों पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला। उन्होंने अनुवाद के विभिन्न प्रकारों की चर्चा करते हुए वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में इसकी बढ़ती उपयोगिता को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि अनुवाद भाषाओं को समृद्ध करने के साथ-साथ साहित्य-सृजन, ज्ञान के प्रसार और विभिन्न भाषाई समुदायों के मध्य संवाद स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
दूसरे प्रमुख वक्ता प्रो विनोद मिश्रा, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), रुड़की, जिन्होंने पूर्व में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, पटना में भी अपनी सेवाएँ दी हैं, ने अनुवाद के विभिन्न रूपों, समतुल्यता की समस्या तथा भाषाई एवं सांस्कृतिक समृद्धि में अनुवाद की भूमिका पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने अनुवाद के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक पक्ष को रेखांकित करते हुए बताया कि आधुनिक विमर्श में अनुवाद को केवल भाषांतरण की प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जा सकता।

प्रो मिश्रा ने इस तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट किया कि इतिहास में अनुवाद का उपयोग एक ओर औपनिवेशिक सत्ता के उपकरण के रूप में हुआ, वहीं दूसरी ओर इसी अनुवाद ने औपनिवेशिक विमर्श को चुनौती देने तथा उसके प्रतिरोध का माध्यम बनने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतीय वाङ्मय एवं भारतीय साहित्य के विभिन्न ग्रंथों के उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया कि अनुवाद केवल भाषाई गतिविधि नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक चेतना है। यह राष्ट्र-निर्माण, व्यक्ति के बौद्धिक विकास तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्मिता के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वेबिनार के तीसरे प्रमुख वक्ता डॉ बबलू रे, भाषा विज्ञान विभाग, डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय,सागर, मध्यप्रदेश ने भाषा, संस्कृति, राजनीति और साहित्य के पारस्परिक संबंधों को अनुवाद के संदर्भ में विवेचित किया। उन्होंने अपने व्याख्यान में रेखांकित किया कि अनुवाद औपनिवेशिक संरचनाओं और विमर्शों को समझने तथा उन्हें चुनौती देने का एक महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। अनुवाद के द्वारा विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के नए आयाम सामने आते हैं तथा ज्ञान और साहित्य को नए संदर्भों में समझने की संभावनाएँ विकसित होती हैं। डॉ रे ने यह भी स्पष्ट किया कि भाषा का संबंध केवल संस्कृति से ही नहीं, बल्कि व्यक्ति और समुदाय की स्मिता, सामाजिक चेतना तथा साहित्य से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। इस दृष्टि से अनुवाद विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक समुदायों के बीच संवाद स्थापित करने का एक प्रभावी माध्यम बनता है।

कार्यक्रम में वक्ताओं के व्याख्यानों से यह विचार प्रमुखता से उभरकर सामने आया कि आज जब विश्व अनुवाद की अनिवार्यता और प्रासंगिकता को व्यापक रूप से स्वीकार कर रहा है, तब भाषाई समृद्धि को सांस्कृतिक समृद्धि से अलग करके नहीं देखा जा सकता। अनुवाद भाषा, साहित्य और संस्कृति को एक-दूसरे से जोड़ने के साथ-साथ विभिन्न समाजों के बीच ज्ञान एवं विचारों के आदान-प्रदान का सेतु भी निर्मित करता है।
कार्यक्रम के सफल आयोजन में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर संजय कुमार चौधरी का विशेष मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन रहा। उनके कुशल नेतृत्व में विश्वविद्यालय में अकादमिक, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को निरंतर बढ़ावा दिया जा रहा है। वे शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को संगोष्ठियों, वेबिनारों तथा अन्य शैक्षणिक गतिविधियों के माध्यम से अपने ज्ञान और बौद्धिक क्षितिज को विस्तृत करने के लिए सदैव प्रेरित करते रहे हैं।
कार्यक्रम के आरंभ में प्रेसिडेंट प्रो पुनिता झा ने अपने स्वागत एवं आशीर्वचन में अनुवाद की उपयोगिता और उसके व्यापक महत्व पर प्रकाश डालते हुए प्रतिभागियों को संबोधित किया।
राष्ट्रीय वेबिनार के आयोजन एवं सफल संचालन में संयोजक डॉ संकेत कुमार झा, कोऑर्डिनेटर डॉ शांभवी, ऑर्गनाइजिंग सेक्रेटरी डॉ बीरेन्द्र मिश्रा तथा जॉइंट ऑर्गनाइजिंग सेक्रेटरी डॉ अरीका पॉल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम के चीफ एडवाइजर डॉ नवीन कुमार सिंह ने अपने मार्गदर्शन से आयोजन को सफल बनाने में विशेष योगदान दिया।
वेबिनार में लगभग एक सौ प्रतिभागियों एवं छात्र-छात्राओं की सक्रिय सहभागिता रही। आरंभ से अंत तक प्रतिभागियों ने विद्वान वक्ताओं के विचारों को गंभीरता से सुना तथा अनुवाद के ऐतिहासिक, भाषाई, साहित्यिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आयामों से परिचित हुए।

अनुवाद दिवस पर आयोजित इस राष्ट्रीय वेबिनार ने अनुवाद को महज एक भाषा से दूसरी भाषा में अर्थ-संप्रेषण की प्रक्रिया के बजाय भाषाओं, संस्कृतियों, साहित्य और स्मिताओं के बीच संवाद स्थापित करने वाली एक व्यापक बौद्धिक एवं सांस्कृतिक प्रक्रिया के रूप में समझने का अवसर प्रदान किया।

Santosh Dutta Jha: