आयोजन में मुख्य वक्ता के रूप में इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, प्रयागराज के संगीत विभागाध्यक्ष विद्वान प्रोफ़ेसर पं प्रेम कुमार मल्लिक (दरभंगा घराना)ने संगीत विद्वद्द्वय का स्मरण करते हुए संगीत में उनके अमूल्य योगदानों को विद्यार्थियों के बीच रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि संगीत विषय में निरंतर आगे बढ़ाने की इच्छाशक्ति, प्रतिद्वंदिता और निरंतर आगे बढ़ाने हेतु सदैव तत्पर रहने की आवश्यकता होती है।साथ ही, संगीत गायन के गूढ़ तत्त्वों को भी छात्रों को सरल रूप में समझाया।पंडित पलुस्कर को याद करते हुए कहा कि उन्होंने संगीत को गुरुकुल-परंपरा से संस्थागत रूप में लाने का अमूल्य कार्य किया जिससे इसे सीखने में आसानी हो ।
विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. पुष्कर कुमार झा ने अपने विचारों को साझा करते हुए कहा कि पंडित पलुस्कर ने संगीत-शिक्षा को परिमार्जित किया और स्वरलिपि-पद्धति तथा बंदिशों में भक्तिपरक शब्दावली की ओर ध्यान आकृष्ट किया।
इससे पूर्व इस आयोजन में उपस्थित सभी अतिथियों ने सम्मिलित रूप से दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का आरंभ किया तथा विद्वानों के चित्र पर माल्यार्पण के बाद विभागीय छात्र-छात्राओं द्वारा कुलगीत की प्रस्तुति की गई।
आगत अतिथि का स्वागत करते हुए विभागाध्यक्ष प्रो लावण्य कीर्ति सिंह ‘काव्या’ ने आयोजन के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पंडित विष्णु दिगंबर पर उठकर भारतीय संगीत के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नाम है। पं पलुस्कर ने विश्व भर में भारतीय संगीत की पवित्रता को रेखांकित करते हुए गेय बंदिशों में सात्विकता को महत्वपूर्ण स्थान दिया। महात्मा गांधी की सभाओं में अपनी उपस्थिति को निरंतर कायम रखा। वहीं ‘भारतरत्न’ उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का स्मरण करते हुए डॉ काव्या ने कहा की उनका संबंध दरभंगा से सदा रहा। राजदरभंगा के वे नियमित संगीतज्ञ थे। उस्ताद अपने अंतिम दिनों में दरभंगा को निरंतर याद करते रहे और यहां आने की इच्छा भी जाहिर की थी। उनकी शहनाई सदैव गूंजती रहेगी।
अन्त में विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ अभिषेक स्मिथ ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि पं पलुस्कर और उस्ताद बिस्मिल्ला खां विश्व पटेल पर सदैव स्मरणीय रहेंगे।