ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के एनएसएस कोषांग द्वारा ‘युवा आपदा मित्र आवासीय प्रशिक्षण’ पांचवें दिन जारी


प्रशिक्षकों द्वारा स्वयंसेवकों को वज्रपात, शीतलहर, लू, आगलगी, सर्पदंश, जल, जीवन और हरियाली पर दी गई विस्तृत जानकारी
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के एनएसएस कोषांग के द्वारा बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, पटना के सौजन्य से समस्तीपुर जिला के 200 स्वयंसेवक छात्र-छात्राओं का सात दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण शिविर विश्वविद्यालय परिसर में पांचवें दिन जारी रहा। यह शिविर 16 अगस्त को जुबिली हॉल में प्रारंभ हुआ था जो 22 अगस्त तक चलेगा। शिविर का प्रारंभ राष्ट्रगीत एवं एनएसएस लक्ष्य-गीत के ससम्मान सामूहिक गायन से हुआ।


प्रथम सत्र में आपदा प्रशिक्षक तनुजा कुमारी ने शीतलहर से सुरक्षित रहने की जानकारी देते हुए बताया गया कि शीतलहर तब होती है, जब तापमान सामान्य से अचानक काफी नीचे गिर जाता है और बर्फीली हवाएं चलती हैं। यह विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और बीमार व्यक्तियों के लिए जोखिम भरी हो सकती है।
शीतलहर से बचने हेतु कुछ सावधानियाँ भी बताई गई, जिसमें विशेष रूप से शरीर को ढककर रखना, गरम और पौष्टिक आहार का सेवन, सफर के दौरान सतर्कता बरतना, जरूरत होने पर ही घर से बाहर निकलना इत्यादि। बताया कि यदि लगातार कंपकंपी हो, त्वचा पीली या सुन्न पड़ने लगे या बोलने में लड़खड़ाहट आए तो पीड़ित व्यक्ति को तुरंत गर्म जगह पर ले जाएं और डॉक्टरी सलाह लें। ‎एसडीआरएफ प्रशिक्षक रूपेश कुमार पासवान ने बताया कि आगलगी जीवन और संपत्ति दोनों के लिए एक बड़ा खतरा है। थोड़ी-सी सतर्कता और सही जानकारी से अधिकांश हादसों को टाला जा सकता है। आगजनी के कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि अच्छी गुणवत्ता की वायरिंग और MCB का प्रयोग करें, एक सॉकेट में कई प्लग न लगाएं, गैस रिसाव होने पर बिजली के स्विच न छुएँ और खिड़कियां व दरवाजा खोल दें। घर व ऑफिस में अग्निशामक यंत्र और बिल्डिंग में स्मोक डिटेक्टर लगाएं, बाहर निकलने के आपातकालीन रास्ता अवश्य बनाए इत्यादि।

आग लगने पर निपटने के उपाय बताते हुए फायर ब्रिगेड को तुरंत सूचित करने, कमरे में धुआं भरा हो तो नीचे झुककर या पेट के बल रेंगकर बाहर निकले, क्योंकि जमीन की सतह पर ऑक्सीजन की मात्रा अधिक होती है, लिफ्ट का प्रयोग नहीं करने, शरीर में आग लगने पर भागने की जगह “रुको, झुको और लुढ़को” का नियम अपनाने, आग लगने पर हमेशा सीढ़ियों का ही इस्तेमाल करने आदि की जानकारी दी गई।
लू से बचने की जानकारी देते हुए प्रशिक्षक रूपेश कुमार ने बताया कि लू के संपर्क में आने से शरीर का तापमान अनियंत्रित हो जाता है और डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ जाता है।

लू लगने के प्रमुख लक्षण के तहत तेज बुखार, सिरदर्द होना, अत्यधिक प्यास लगे और चक्कर आए, त्वचा का रंग लाल होना, शरीर का गर्म, सूखा और पसीना नहीं होना, उल्टी या जी मिचलाना और शरीर में भारी कमजोरी महसूस होना आदि की जानकारी दी गई। इसके प्राथमिक उपचार के दौरान बताया गया कि पीड़ित को तुरंत ठंडी या छायादार जगह पर लिटा दें। पीड़ित के कपड़े ढीले करना और शरीर के तापमान को कम करने के लिए ठंडे पानी की पट्टियां देना या गीले कपड़े से शरीर को पोंछना। लक्षण गंभीर होने पर बिना देरी किए डॉक्टर के पास ले जाना आदि।
प्रशिक्षक रूपेश कुमार पासवान ने सर्पदंश के कारण, लक्षण, प्रभाव एवं बचने के तरीकों तथा सांपों के प्रकार आदि की विस्तृत जानकारी दी। विषैले एवं विषहीन सांपों की पहचान, सांप काटने पर क्या करें क्या न करें तथा सर्पदंश से बचने के तरीके एवं उपचारों की भी जानकारी दी। भारत में 85% सांप विषहीन होते हैं। भारत में प्रतिवर्ष सांप काटने से 51 हजार व्यक्तियों की मृत्यु होती है। विषैला सांप काटने पर दो सेंटीमीटर की दूरी पर शरीर में दो गड्ढे बन जाते हैं, परंतु विशहीन सांप काटने से अनेक गड्ढे बन जाते हैं।


प्रशिक्षक राजू कुमार ने वज्रपात के मुख्य कारण, प्रभाव एवं बचने के उपायों की विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि बिहार में 2024 में वज्रपात से 304 लोगों की मृत्यु हुई थी।
प्रशिक्षक खोखो कुमार ने जल, जीवन और हरियाली की विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि ये तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। पानी के बिना जीवन असंभव है और हरियाली के बिना न तो शुद्ध हवा, न ही जलचक्र संभव है। पेड़-पौधे धरती के फेफड़े हैं, जिनका संरक्षण न केवल पर्यावरण संरक्षण के लिए ही नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों के अस्तित्व की बुनियादी जरुर है। एसडीआरएफ सदस्य में हवलदार कृष्णनंदन सिंह, मालिक कुमार, रूपेश कुमार पासवान, खोखो कुमार, देव कुमार, राजू कुमार, तनुजा कुमारी, संतोषी कुमारी आदि उपस्थित थे। वहीं संयोजक डॉ आर एन चौरसिया, डॉ शबनम कुमारी, डॉ प्रेम कुमारी, डॉ अनुपम प्रिया, मुकेश कुमार झा, मणिकांत ठाकुर, अमित कुमार झा, रवीन्द्र कुमार सिंह, प्रशांत कुमार, सुमित कुमार, विजय, अंकित आदि ने शिविर में सक्रिय योगदान किया।

Santosh Dutta Jha: