विश्वविद्यालय दर्शनशास्त्र विभाग द्वारा ‘योग के माध्यम से आरोग्य एवं आनन्द : भारतीय ज्ञान-परंपरा की अन्तर्निहित प्रज्ञा’ विषय पर सेमिनार आयोजित

योग तन, मन और आत्मा में समन्वय करने वाला एवं भारतीय ज्ञान-परंपरा का काफी महत्त्वपूर्ण एवं अति प्रासंगिक धरोहर- कुलपति

योग जीवन जीने की कला तथा तन एवं मन में समन्वय का विज्ञान जो आत्म शुद्धि, मान पर नियंत्रण एवं मोक्ष प्राप्ति का माध्यम- प्रो कुसुम कुमारी

हाइब्रिड मोड में आयोजित निःशुल्क सेमिनार में 425 से अधिक व्यक्तियों ने किया पंजीकरण, जबकि 200 से अधिक शोध पत्रों का हुआ वाचन

योग हमें कर्म को ही धर्म मानना सीखना है। इसे अपनाकर ही भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बन सकता है। योग से लोभ, मोह, क्रोध, भय, तनाव एवं उद्विग्नता आदि पर नियंत्रण पाया जा सकता है। उक्त बातें ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के कुलपति प्रोफेसर संजय कुमार चौधरी ने विश्वविद्यालय दर्शनशास्त्र विभाग के तत्त्वावधान में जुबिली हॉल में “योग के माध्यम से आरोग्य एवं आनन्द भारतीय ज्ञान-परम्परा की अन्तर्निहित प्रज्ञा” विषय पर भारतीय दार्शनिक अनुसंधान केन्द्र (आईसीपीआर), शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली द्वारा हाइब्रिड मोड में प्रायोजित नि:शुल्क राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कही। कुलपति ने कहा कि योग तन, मन और आत्मा में समन्वय करने वाला तथा हमारी भारतीय ज्ञान-परंपरा का काफी महत्त्वपूर्ण एवं जनोपयोगी उपहार एवं धरोहर है। उन्होंने एनएसएस समन्वयक द्वय को निर्देशित किया कि वे “आर्ट ऑफ़ लिविंग”, दरभंगा के साथ मिलकर विश्वविद्यालय में पांच दिवसीय शिविर का आयोजन करें। यदि आर्ट ऑफ लिविंग के सात बिन्दुओं का समुचित ज्ञान एवं उनपर ठीक से प्रयोग हो तो जीवन की आधी समस्याएं स्वत: दूर हो जाएंगी।

मुख्य वक्ता के रूप में मगध विश्वविद्यालय, बोधगया की पूर्व दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्षा एवं प्रति-कुलपति प्रो कुसुम कुमारी ने कहा कि मिथिला विद्वानों की धरती रही है। योग हमारी प्राचीन धरोहर एवं संस्कृति है, जिसमें काफी शक्ति होती है। यह आत्मशुद्धि, मन पर नियंत्रण एवं मोक्ष-प्राप्ति का माध्यम है। कहा कि यह हमें शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ एवं समृद्ध बनाता है। यह जीवन जीने की कला तथा तन एवं मन में समन्वय का विज्ञान है। इन्द्रियों को नियंत्रित करने वाला योग विज्ञान और अध्यात्म के बीच मजबूत सेतु काम करता है। इससे स्मरणशक्ति एवं एकाग्रता बढ़ती है, मन स्थिर होता है, जीवन आनन्दमय तथा रोग नियंत्रित होता है। भारत के विश्व-गुरु बनने में योग की काफी भूमिका है। उन्होंने कहा कि योग हमारे तन, मन एवं आत्मा को शुद्ध करता है और आत्मा को परमात्मा से मिलाता है।

योगाभ्यास से बिहार की समृद्ध परंपरा आगे बढ़ेगी। कहा कि योग से शरीर स्वस्थ, मन स्थिर तथा स्मरण शक्ति तीव्र होती है। सेमिनार आयोजनों को बधाई देते हुए कहा कि इसके मुख्य उद्देश्यों की पूर्ति तो तकनीकी सत्रों में ही होगी। उन्होंने विभिन्न कॉलेजों में पीजी की पढ़ाई शुरू करने के लिए कुलपति को साधुवाद देते हुए बीएमए कॉलेज, बहेड़ी में बीएससी एवं पीजी की पढ़ाई शुरू होने पर प्रसन्नता व्यक्त किया तथा कहा कि कुलपति की सक्रियता के कारण ही रोक के बाद भी सरकार द्वारा उस कॉलेज में पद सृजित किए गए।

आमंत्रित वक्त के रूप में आर्ट ऑफ लिविंग के बिहार प्रभारी आनन्द प्रकाश राय ने कहा कि सकारात्मक को बढ़ाने एवं मस्तिष्क पर नियंत्रण करने के लिए योग जरूरी है। उन्होंने योग की भूमिका को रेखांकित करते हुए से कई व्यावहारिक उदाहरणों से समझाया। उन्होंने कुलपति के आग्रह पर एनएसएस के सहयोग से विश्वविद्यालय में पांच दिवसीय आर्ट ऑफ लिविंग शिविर लगाने पर सहमति दी। विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं विशिष्ट वक्ता डॉ रुद्र कान्त अमर ने कहा कि संपूर्ण भगवद्गीता योगमय है, जिसके सभी अध्यायों के नाम में योग से जुड़ा है। कहा कि पतंजलि- योग और गीता-योग में अंतर है। पतंजलि ने मन पर नियंत्रित करने वाला, जबकि गीता कार्यों में कुशलता को योग माना है। गीता मनोविज्ञान है जो हमें बुद्धियोगी बनती है।

राष्ट्रीय सेमिनार का प्रारंभ दीप प्रज्वलन से हुआ। प्रारंभ में विश्वविद्यालय का कुलगीत तथा अन्त में राष्ट्रगान हुआ। अतिथियों द्वारा स्मारिका का भी विमोचन किया गया। सेमिनार संयोजक डॉ प्रियंका राय के संचालन में आयोजित उद्घाटन सत्र में अतिथि स्वागत दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ शिखर वासिनी ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन संस्कृत-प्राध्यापक डॉ आर एन चौरसिया ने किया। अतिथियों का स्वागत पाग, चादर, मोमेंट, लीली-पौधे तथा पुष्पगुच्छ से किया गया। चार समानांतर तकनीकी सत्रों का आयोजन क्रमशः डॉ कृष्णकांत झा, डॉ शिखर वासिनी, डॉ रुद्राकांत अमर एवं डॉ आर एन चौरसिया की अध्यक्षता में किया गया, जिनका संचालन क्रमशः डॉ संजीव कुमार शाह, डॉ ममता स्नेही, डॉ सोनी शर्मा तथा डॉ प्रियंका राय द्वारा किया गया, जिनमें 200 से अधिक शोध पत्रों का वाचन किया गया। डॉ प्रियंका ने बताया कि सेमिनार में ऑनलाइन एवं ऑफलाइन माध्यम से 425 से संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, पदाधिकारी, विद्यार्थी एवं शोधार्थी उपस्थित थे, जिनमें कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, त्रिपुरा, केरल, महाराष्ट्र, राजस्थान, जम्मू एवं कश्मीर, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा आदि राज्यों के प्रतिनिधि शामिल थे। फीडबैक फॉर्म भरने वाले प्रतिभागियों को ऑनलाइन प्रमाण पत्र निर्गत किया जाएगा, जबकि भौतिक रूप से भाग लेने वाले शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को भी प्रमाण पत्र दिया जाएगा।

Santosh Dutta Jha: