जीवन और मृत्यु के बीच के सबसे कठिन क्षणों में भी मानवता का दीप जलाने वाले कमतौल निवासी लिल्हा परिवार को गुरुवार को दधीचि देहदान समिति, बिहार ने सम्मानित किया। स्व. जयसूर्या कुमारी (पति श्री उदित कुमार लिल्हा) के अंतिम संस्कार की पूर्णाहुति एवं पगड़ी की रस्म के अवसर पर समिति के प्रतिनिधियों ने उनके आवास पहुंचकर पद्मश्री श्री विमल जैन एवं सिक्किम के पूर्व राज्यपाल श्री गंगा प्रसाद के संयुक्त हस्ताक्षर से प्रेषित प्रशस्ति-पत्र एवं अंगवस्त्र भेंट कर परिजनों के साहस और मानव सेवा के संकल्प को नमन किया।
गौरतलब है कि 30 मई को प्रसव पीड़ा के बाद जयसूर्या कुमारी को डीएमसीएच, दरभंगा में भर्ती कराया गया था। शल्य चिकित्सा के माध्यम से एक स्वस्थ शिशु का जन्म हुआ। दोनों परिवारों में नई खुशियों का माहौल था, लेकिन कुछ ही क्षणों बाद जयसूर्या की तबीयत अचानक बिगड़ गई और उन्होंने अंतिम सांस ली। जिस घर में नवजीवन के आगमन की खुशियां गूंज रही थीं, वहीं पल भर में मातम छा गया।
ऐसे असहनीय दुःख के बीच पति उदित कुमार लिल्हा एवं दोनों परिवारों ने अदम्य साहस, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व का परिचय देते हुए जयसूर्या के दोनों नेत्र दान करने का निर्णय लिया। दधीचि देहदान समिति, दरभंगा के सहयोग से नेत्रदान की प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न हुई, जिससे दो जरूरतमंद व्यक्तियों के जीवन में नई रोशनी पहुंच सकी।
दधीचि देहदान समिति के क्षेत्रीय संगठन मंत्री मनमोहन सरावगी ने परिजनों को सम्मानित करते हुए कहा कि “धन्य है लिल्हा परिवार तथा जयसूर्या के मायके पक्ष के पिता मुकेश कुमार प्रसाद एवं माता विनीता देवी, जिन्होंने अपनी बेटी को खोने के असहनीय दुःख के बीच भी मानवता को सर्वोपरि रखा। यह निर्णय केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है।”
इस अवसर पर ताऊ अशोक कुमार लिल्हा, पिता अरुण कुमार लिल्हा, पति उदित कुमार लिल्हा, बड़े भाई विनीत कुमार लिल्हा, गौरव कुमार लिल्हा, गोपेश कुमार लिल्हा, सौरभ कुमार लिल्हा, फूफा विजय कुमार खेड़िया तथा समाज के अन्य गणमान्य उपस्थित रहे।
सचिव कुमार आदर्श ने कहा कि एक व्यक्ति के नेत्रदान से दो लोगों के जीवन में उजाला लाया जा सकता है और जयसूर्या कुमारी का यह महादान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा।
जयसूर्या के पिता मुकेश कुमार प्रसाद ने कहा कि उनकी पुत्री भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी आंखों की रोशनी किसी और की दुनिया को प्रकाशित कर रही है। एक ओर उनकी गोद का नवजात शिशु अपनी मां के स्नेह से वंचित हो गया, तो दूसरी ओर उनका नेत्रदान दो अनजान लोगों के जीवन में उम्मीद और प्रकाश की नई किरण बन गया। दुख की इस घड़ी में लिया गया यह निर्णय करुणा, त्याग और मानवता की ऐसी अमिट मिसाल है, जिसे समाज लंबे समय तक याद रखेगा।