मैं दुलारी देवी हूं। बिहार के मधुबनी के गांव रांटी की रहने वाली हूं। मुझे मधुबनी पेंटिंग में पद्मश्री सम्मान मिला है। इस समय 80 बच्चों को मिथिला इंस्टीट्यूट में ट्रेनिंग दे रही हूं। जिस अस्पताल में मेरी बेटी ने आखिरी सांस ली- उसी की दीवार पर मैंने पेंटिंग बनाई।
लोग पूछते हैं- दुलारी, ये सब कैसे कर लेती हो? बस कहती हूं- दर्द को रंग बना लिया, नहीं तो जी नहीं पाती। हर पेंटिंग में एक बच्चा बनाती हूं। वो बच्चा दरअसल मेरी बेटी होती है। इस तरह उसे रंगों में जिंदा रखती हूं।
एक बार मैं चेन्नई गई। वहां अपनी जिंदगी की कहानी पेंट की। वो पेंटिग किताब के रूप में आई, जिस पर 14 साल से रॉयल्टी मिल रही है।
देश-दुनिया में मशहूर मधुबनी पेंटिंग को अपने घर पर बनाती हुईं दुलारी देवी। बेटी के गुजरने के बाद उन्होंने पेंटिंग को अपनी जिंदगी बना लिया।
देश-दुनिया में मशहूर मधुबनी पेंटिंग को अपने घर पर बनाती हुईं दुलारी देवी। बेटी के गुजरने के बाद उन्होंने पेंटिंग को अपनी जिंदगी बना लिया।
बचपन से शुरू करती हूं। हमारा स्कूल, कॉपी किताब से कोई नाता नहीं रहा। ज्यादातर जीवन गरीबी और कष्ट में बीता। हम मल्लाह समुदाय से हैं। हम चार बहनें, एक भाई थे और माता-पिता थे। दो जून की रोटी के लिए माता-पिता के साथ मजदूरी करते थे।
छोटी थी तो पिता के साथ तालाब में मछली पकड़ने और मखाना निकालने जाती थी। सर्दी, बारिश, गर्मी कुछ भी हो, हमें तालाब या नदी पर काम के लिए जाना ही पड़ता। जब मेरे भाई, बहन काफी छोटे थे, तभी पिता जी गुजर गए। उसके बाद तो हमारी मुश्किलें और बढ़ गईं। अकेली मां सब कुछ संभाल बहुत नहीं पा रही थीं। कई बार तो भूखे रहने की नौबत आई।
जब 12 साल की हुई तो मेरी शादी कर दी गई। उस समय एक तरह से बच्ची ही थी। ससुराल में बड़ा परिवार था। छह ननद, एक देवर और सास ससुर। वहां भी घर चलाने के लिए सभी मजदूरी करते थे। ससुराल में मछलियां, घास बेचने जाती थी। पति बहुत गुस्सैल स्वभाव के थे। वह मुझ पर बहुत चिल्लाते थे। इतना बुरा सहन नहीं होता था, लेकिन पति को परमेश्वर मानकर सब सहती थी।
लेकिन जब वह मुझे आधी रात को घर से निकाल देते तो बहुत खराब लगता। ससुर भी उनका ही साथ देते। उस वक्त पड़ोसी के घर जाकर रहती। एक दिन जब उन्होंने घर से निकाला तो मायके आ गई। तब शादी के सात साल हुए थे। उसके बाद मैं कभी वापस नहीं गई।
मायके आई तो बेटी पैदा हुई। उसके पैदा होने पर घर में बहुत खुशी थी। एक तरह से वह मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खुश बन गई। उसका नाम शकुंतला रखा। ससुर जी बेटी को देखने आए थे, लेकिन पति का व्यवहार बिल्कुल भी नहीं बदला था। इसलिए ठान लिया कि अब ससुराल नहीं लौटूंगी। बाकी की जिंदगी बेटी के साथ काट लूंगी।
जब बेटी थोड़ी बड़ी हुई तो मां दूसरी शादी के लिए जोर देने लगीं, लेकिन मैंने हर बार मना कर दिया। सोच रही थी कि एक शादी में कुछ भी अच्छा नहीं रहा। बहुत ठोकरें लगीं। दूसरी भी वैसी निकली तो क्या होगा। इस तरह दोबारा शादी का मन ही नहीं हुआ।
इस बीच, बेटी बीमार हो गई। उसे अस्पताल दिखाने ले गए। वहां पता चला कि उसे टायफाइड है। डॉक्टरों ने दवा दी, लेकिन उसकी तबीयत बिगड़ती चली गई। एक हफ्ते बाद उसकी मौत हो गई। बेटी की लाश सामने पड़ी थी। लगा कि सब कुछ बिखर गया।
सोच रही थी कि पति अच्छा न निकले तो एक औरत अपनी औलाद के सहारे रह लेती है, लेकिन अब बेटी भी साथ छोड़ गई थी। बाद में मेरी बेटी की जिस अस्पताल में मौत हुई, उसी की दीवार पर जाकर पेंटिंग बनाई थी।
बेटी के जाने के बाद बहुत परेशान थी। सोच रही थी कि अब जिंदगी कैसे गुजारूंगी। फिर गांव में कर्पूरी माझी के घर गई। वह मधुबनी पेंटिंग बनाते थे। उनके घर खाना बनाती और साफ-सफाई का काम करने लगी। उस वक्त मेरे दादा भी उनके ही घर काम करते थे।
मेरी हालत देखकर एक दिन कर्पूरी ने कहा कि तुम मेरे ही यहां रहा करो। मेरी मां ने इजाजत दी, फिर उनके यहां ही रहने लगी। माझी ने मुझे अपने घर पर रहने के लिए एक बिस्तर और लालटेन दिया था। समय बिताने के लिए पेंट और ब्रश। वह काम करने का मुझे रोज 6 रुपए और 4 रोटी देते थे।
इस तरह उनके घर काम करते हुए पेंटिंग सीखने लगी। माझी गणेश भगवान की पेंटिंग बहुत अच्छी बनाते थे। वह मुझे पेपर, पेंट और ब्रश देकर कहते- इस पर अपना नाम लिखो और फूल वगैरह बनाओ। मधुबनी पेंटिंग सीख लो, यह अपने मिथिला की ही कला है।
उसके बाद रोज माझी और चाची दाई जब पेंटिंग बनाते तो उनके पास खड़ी होकर देखती। धीरे-धीरे बनाने लगी। सबसे पहले ग्रीटिंग कार्ड पर काम शुरू किया। उसका पैसा मिलता था। इस तरह उनके साथ काम करते हुए पेंटिंग में मन लगने लगा।
कर्पूरी माझी मेरी लगन देखकर बहुत खुश हुए। गांव में सरकार की तरफ से पेंटिंग सिखाने के लिए कुछ लोग आए थे। माझी ने उनके रजिस्टर में मेरा भी नाम लिखवा दिया। वहां पहला दिन था। पेंटिंग करने के लिए मुझे एक साटन का कपड़ा दिया गया। वह बहुत चमकीला और सुंदर था। उससे पहले मैंने उतना चमकीला कपड़ा नहीं देखा था। घबराकर उस पर पेंटिंग बनाने से इनकार कर दिया और वापस लौट आई।
कर्पूरी को जब पता चला तो उन्होंने मुझे डांटा। कहा- ऐसा कैसे चलेगा। दूसरे दिन उन्होंने फिर जाने को कहा। वहां गई, इस बार सूती कपड़ा दिया गया। उस पर मैंने एक फूल बनाया। फिर साड़ी पर काम करना सीखने लगी। इस तरह वहां पेंटिंग करती और आकर माझी के घर रहती। उसके बाद तो पेटिंग में खोने लगी। बाद में वहीं इंस्टीट्यूट खुला और वहां मैंने कुल 16 साल तक पेंटिंग का काम किया।
उस दौरान कर्पूरी माझी ने बहुत सहारा दिया। एक दिन घर पर खाना बना रही थी। वह आए और कहा कि अकेली हो, आगे की जिंदगी कैसे गुजारोगी? शादी कर लो, लेकिन मैंने दूसरी शादी से मना कर दिया। कहा कि अब मधुबनी पेंटिंग ही मेरी पूजा है। ये रंग ही मेरी जिंदगी हैं।
फिर उन्होंने पूछा कि कि बेटी की याद नहीं आती? मैंने कहा कि बेटी की याद तो आती है, लेकिन उसे ही याद करती रहूंगी तो पेंटिंग कैसे बनेगी। यह सब करते हुए कर्पूरी माझी के पास 25 साल रही और पेंटिंग बनाती रही। हर पेंटिंग में एक बच्चा बनाती हूं। वो मेरी बेटी होती है।
दरअसल, मुझे बच्चे बहुत अच्छे लगते हैं। कहीं भी आते-जाते बच्चों का कपड़ा दिखे तो खरीद लेती हूं। जब लोग अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने, लाने जाते हैं। किसी बेटी की शादी हो रही होती है तो अपनी बेटी शकुंतला की बहुत याद आती है। यही सारी वजहें हैं कि मेरी हर पेंटिंग में एक छोटा बच्चा जरूर होता है।
पेंटिंग बनाती हुईं दुलारी देवी। गांव में कर्पूरी माझी की मदद से पेंटिंग सीखी। बेटी के जाने के बाद उन्होंने लोगों के घरों में बर्तन साफ किया। मधुबनी पेंटिंग को अपनी जिंदगी बनाई।
एक बार बिहार सरकार की तरफ से हम चेन्नई में एक पेंटिंग के आयोजन में गए। वहां मुझे पेंटिंग में अपनी जिंदगी की कहानी पेंट करने को कहा गया। मैंने काम शुरू किया। उसमें दिखाया कि कैसे चौका-बर्तन करती थी। धान रोपती थी, घास बेचने, मछली बेचने जाती थी।
जब चार दिन बीत गए तो आयोजकों ने कहा कि अब रहने दो। उस पर मैंने उनसे कहा था कि अभी मेरी कहानी पूरी नहीं हुई है। फिर उन मोटे कागजों को अपने घर लेकर आई और एक-एक करके सारी कहानी पेंट की। बाद में वो पेंटिंग एक किताब के रूप में आई। उस किताब पर मुझे 14 साल से रॉयल्टी मिल रही है।
आप यहां मेरे घर की दीवारों पर देखिए। इन पर मधुबनी की पेंटिंग बनी है। इस पेंटिंग में मल्लाह, मछली, मखाना, मखाने का पत्ता, बांस, नाव बनाए हैं। लोग मेरे घर जब मुझसे मिलने आते हैं तो वे भी इसमें रंग भरते हैं। दरअसल, मेरे जीवन में बहुत कुछ खाली था। इन्हीं रंगों ने भरा। रंग ही सब कुछ हैं दुनिया में। रंग के बिना जीवन रूखा हो जाएगा।
अंत में कहूंगी कि जीवन में बहुत दुख था। बहुत ठोकरें लगीं, लेकिन उनसे उबर गई। 2021 में मुझे पद्मश्री सम्मान मिला। उसके बाद मुझे बिहार म्यूजियम में सम्मानित किया गया। उस दिन बहुत रोई थी। मुझे पल-पल ठोकर खाना याद आ रहा था।
इस समय मिथिला आर्ट इंस्टीट्यूट में बच्चों को मिथिला की कला, गीत सिखा रही हूं। इसमें 80 बच्चे हैं। इन बच्चों के साथ बहुत अच्छा लगता है। तमन्ना है कि बच्चे इस कला को आगे भी बचाकर रखें।
दुलारी इस समय मिथिला आर्ट इंस्टीट्यूट में बच्चों को मिथिला की कला, गीत सिखा रही हैं। इसमें 80 बच्चे हैं। उनकी तमन्ना है कि बच्चे इस कला को आगे भी बचाकर रखें।
दुलारी इस समय मिथिला आर्ट इंस्टीट्यूट में बच्चों को मिथिला की कला, गीत सिखा रही हैं। इसमें 80 बच्चे हैं। उनकी तमन्ना है कि बच्चे इस कला को आगे भी बचाकर रखें।
(पद्मश्री से सम्मानित दुलारी देवी ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए।
1-संडे जज्बात-मैं मुर्दा बनकर अर्थी पर भीतर-ही-भीतर मुस्कुरा रहा था:लोग ‘राम नाम सत्य है’ बोले तो सोचा- सत्य तो मैं ही हूं, थोड़ी देर में उठकर साबित करूंगा
मेरा नाम मोहनलाल है। बिहार के गयाजी के गांव पोची का रहने वाला हूं। विश्व में शायद अकेला ऐसा इंसान हूं, जिसने जिंदा रहते अपनी शव यात्रा देखी। यह बात चंद करीबी लोगों को ही पता थी। मरने का यह सारा नाटक किसी खास वजह से किया गया था।
2- संडे जज्बात-फौजी विधवा की 8 साल के देवर से शादी:मैं मेजर जनरल थी, उसकी बात सुनकर कांप गई; मन करता है कैसे भी उससे मिल लूं
अस्पताल में इलाज के दौरान एक युवा सिपाही की मौत हो गई। वह शादीशुदा था और उसकी विधवा पत्नी की उम्र लगभग 22 साल थी। सिपाही की मौत के बाद एक दिन उसकी पत्नी रोते हुए मेरे पास आई। कहने लगी कि मुझे बचा लीजिए। मेरे ससुराल वाले और मायके के लोग मेरी शादी देवर से कराने जा रहे हैं।