समस्तीपुर में नहाय-खाय पर भगवान भास्कर की पूजा-अर्चना:बूढी गंडक के तट पर व्रतियों की भीड़, बोलीं- परिवार की सुख-समृद्धि के लिए व्रत कर रही हूं।

समस्तीपुर में चार दिवसीय छठ महापर्व के पहले दिन बूढी गंडक नदी के तट पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी है। स्नान के बाद व्रतियों ने भगवान भास्कर की पूजा-अर्चना की। महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुहाग के दीर्घायु होने की कामना की।

रुदौली निवासी रिंकी देवी ने बताया कि वह 5 साल से छठ कर रही हूं। स्नान करने के लिए बूढी गंडक तट आई थी। यहां से जाने के बाद प्रसाद के तौर पर कद्दू-भात का ग्रहण करूंगी। रविवार को खरना होगा। जिसमें खीर और गेहूं की रोटी बनेगी। खरना का विशेष महत्व होता है। इसलिए पूरी आस्था और स्वच्छता के साथ इस पकाया जाता है। गेहूं कुटने के बाद उसे जाता पर पीसा जाता है।

धर्मपुर मोहल्ले की पिंकी देवी ने बताया कि 7 वर्षों से इस पर्व को कर रही हूं। मेरी सास ने यह पर्व समर्पित किया है। वह पानी में भी खड़ा होती है। पूरी आस्था व श्रद्धा के साथ इस पर्व को मानती हैं। परिवार की सुख-समृद्धि की कामना के लिए यह व्रत कर रही हूं।

छठ घाट का निरीक्षण

एमएलसी डॉक्टर तरुण चौधरी भी छठ घाट देखने पहुंचे। नदी में पानी बढ़ जाने के कारण कई घाटों की स्थिति खराब है। जिस कारण उन्होंने लोगों से सतर्कता के साथ पर पर्व मनाने की अपील की है।

50 से 100 रुपए बिक रहा कद्दू

नहाय खाय में कद्दू-भात का विशेष महत्व है। जिस कारण बाजार 50 से 100 रुपए प्रति कद्दू की बिक्री हुई। इसके साथ ही पूजन सामग्री खरीदने के लिए भी बाजारों में लोगों की भीड़ लगी रही।

कद्दू, चने की दाल और चावल बनाया जाता है

व्रती महिलाएं (और कई पुरुष भी) इस दिन पवित्र नदी, तालाब या जलाशय में स्नान करती हैं। इसके बाद वे घर में शुद्धता का विशेष ध्यान रखते हुए सात्विक भोजन तैयार करती हैं। इस दिन का भोजन पूरी तरह बिना लहसुन-प्याज के होता है, जिसमें मुख्य रूप से कद्दू, चने की दाल और चावल शामिल रहते हैं। यह भोजन व्रती के शुद्ध आचरण और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।

खरना और निर्जला व्रत की कठिन साधना

छठ का दूसरा दिन ‘खरना’ कहलाता है, जो अत्यंत कठोर अनुशासन और संयम का दिन होता है। इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जल उपवास रखते हैं और शाम को सूर्यास्त के बाद खीर, रोटी और फल का प्रसाद ग्रहण करते हैं। इसके बाद व्रती अगले 36 घंटे तक निर्जला व्रत रखती हैं।

संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य का दिव्य दृश्य

तीसरे दिन यानी 27 अक्टूबर को संध्या अर्घ्य दिया जाएगा। इस अवसर पर घाटों पर हजारों की संख्या में व्रती और श्रद्धालु एकत्र होते हैं। डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का दृश्य अत्यंत मनोहारी और भावनात्मक होता है। पूरा वातावरण लोकगीतों, छठ के पारंपरिक गीतों और गूंजती आराधना से भर जाता है।

अगले दिन, 28 अक्टूबर को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ इस महापर्व का समापन होता है। यह क्षण भावनाओं से भरा होता है। जब व्रती अपने व्रत की पूर्णता के साथ सूर्य भगवान और छठी मैया को धन्यवाद ज्ञापित करते हैं।

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