संकट में गंगा की मुस्कुराहट! बिहार की नदियों में 35% गंगा डॉल्फिन, पटना का रिसर्च सेंटर ठप।

बिहार की नदियों में 35% गंगा डॉल्फिन:यह राज्य गंगा और उसकी सहायक नदियों के कारण डॉल्फिनों का प्रमुख आवास है. मगर, इस गौरव के बीच चिंता की बात यह है कि इन डॉल्फिनों का अध्ययन करने वाला देश का इकलौता नेशनल डॉल्फिन रिसर्च सेंटर (NDRC), पटना अब तक पूरी तरह कार्यात्मक नहीं हो सका है.

सुल्तानगंज में सबसे अधिक डॉल्फिन:गंगा नदी के बिहार वाले हिस्से में डॉल्फिन की सबसे अधिक संख्या दर्ज की गई है. हाल के सर्वे में यह सामने आया है कि भागलपुर के सुल्तानगंज क्षेत्र में करीब 220 डॉल्फिन पाई गई हैं, जो राज्य में सबसे अधिक है. यहां डॉल्फिन अभयारण्य बनाया गया है.

हाथीदह में 100 से अधिक डॉल्फिन: वहीं पटना जिले के हाथीदह क्षेत्र में भी 100 से अधिक डॉल्फिनें मौजूद हैं. इसके अलावा गंडक, कोसी, सोन और घाघरा जैसी सहायक नदियों में भी इनकी मौजूदगी पाई गई है. इन आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि बिहार में गंगा और उसकी सहायक नदियां डॉल्फिनों का गढ़ है.

केंद्र सरकार के राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्डके नदी डॉल्फिन अनुमान रिपोर्ट के अनुसार 8 राज्यों के 28 नदियों में डॉल्फिन पाई जाती हैं. रिपोर्ट के अनुसार यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पंजाब में कुल 6327 डॉल्फिन हैं. इसमें अकेले बिहार में 2220 डॉल्फिन है. भागलपुर के गंगा में विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य है, जहां बिहार में सबसे अधिक डॉल्फिन पाई जाती हैं. 2022 में यहां 210 से अधिक डॉल्फिन थीं. बिहार की 6 नदियों, गंगा, गंडक, कोसी, महानंदा, कमला-बलान, बागमती में डॉल्फिन पाई जाती हैं.

संकट में गंगा की मुस्कुराहट 

गंगा डॉल्फिन की अनोखी पहचान और जीवनशैली:बिहार के डॉल्फिन मैन के नाम से मशहूर डॉ रविंद्र कुमार सिन्हा बताते हैं कि “गंगा डॉल्फिन का वैज्ञानिक नाम Platanista gangetica gangetica है. यह मछली नहीं बल्कि जलीय स्तनपायी जीव है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह दृष्टिहीन होती है, और दिशा पहचानने के लिए ‘इको लोकेशन’ यानी ध्वनि तरंगों का उपयोग करती है. यह एक मांसाहारी जीव है.”

पानी में रहती है और पानी में डूब कर मरती भी है: डॉ आरके सिन्हा बताते हैं कि डॉल्फिन आमतौर पर 5 से 8 फीट गहराई वाले पानी में ही जीवित रह पाती है. यदि जल का स्तर अत्यधिक बढ़ जाए या गहराई ज्यादा हो जाए तो यह डूबकर मर जाती है.

“इसे हर 30 से 40 सेकंड में ऊपर आकर सांस लेना पड़ता है, इसलिए इसे ‘गंगा की सांस’ भी कहा जाता है. औसतन इसकी लंबाई 2 से 2.5 मीटर होती है और वजन 80 से 90 किलोग्राम तक होता है.”– डॉ आरके सिन्हा

बढ़ी है गंगा में डॉल्फिन की संख्या:रिटायर्ड आईपीएस और बिहार के जाने-माने पर्यावरणविद् प्रांतोष कुमार दास ने बताया कि गंगा डॉल्फिन बिहार में कहलगांव से लेकर सुल्तानगंज तक अधिक पाई जाती है. बीते कुछ वर्षों में इसकी संख्या में बढ़ोतरी हुई है और यह संकेत देता है कि गंगा का जल स्वच्छ हो रहा है. गंगा स्वच्छता के प्रयासों का यह परिणाम भी है कि गंगा डॉल्फिन की संख्या में इजाफा हो रहा है. इकोसिस्टम में इसका काफी योगदान होता है और पानी को यह स्वच्छ करता है. यह डॉल्फिन अपने बच्चों को दूध पिलाती है और इसका दूध सफेद टूथपेस्ट जैसा गाढ़ा होता है. यह भोजन के तौर पर छोटी मछलियों का शिकार करती हैं.

8 राज्यों के 28 नदियों में डॉल्फिन 

“डॉल्फिन नदी की सेहत बताने वाली जीवित लैब है. जहां डॉल्फिन दिखती है, वहां यह मान लेना चाहिए कि गंगा अब भी जिंदा है. पहले पटना में डॉल्फिन अधिक दिखती थी लेकिन अभी भी नालों का पानी बिना ट्रीटमेंट के गंगा नदी में जा रहा है. जिसके कारण गंगा डॉल्फिन पटना में गांधी घाट से काफी दूर हाथीदह शिफ्ट हो गई है.”-प्रांतोष कुमार दास, पर्यावरणविद्

उद्घाटन हुआ पर काम ठप:गंगा डॉल्फिन पर वैज्ञानिक अध्ययन के लिए पटना विश्वविद्यालय परिसर में नेशनल डॉल्फिन रिसर्च सेंटर (NDRC) का निर्माण लगभग ₹30 करोड़ की लागत से किया गया है. इस केंद्र का उद्घाटन 4 मार्च 2024 को हुआ था. यह एशिया का पहला और भारत का एकमात्र ऐसा संस्थान है जो डॉल्फिन पर केंद्रित है. लेकिन एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह केंद्र पूरी तरह गैर-कार्यात्मक बना हुआ है.

पटना का रिसर्च सेंटर अब भी ठप 

इसमें 46 पदों का प्रावधान है, पर अब तक वैज्ञानिकों और तकनीकी कर्मियों की नियुक्ति नहीं हुई है. इसके अलावा आधुनिक उपकरणों और जल अध्ययन सुविधाओं की भी कमी है. इससे न केवल अनुसंधान रुका हुआ है, बल्कि बिहार के इस प्रतिष्ठित केंद्र की भूमिका भी सीमित होकर रह गई है.

जल्द नियुक्ति पूरी करने की चल रही तैयारी:यह केंद्र बिहार में वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अधीन आता है. विभाग के प्रधान सचिव आनंद किशोर ने बताया कि इस केंद्र में जल्द ही सक्रिय शोध कार्य शुरू किए जाएंगे. इस दौरान हर साल 8 शोध परियोजनाएं संचालित होंगी.

“साथ ही 47 पदों की भर्ती प्रस्तावित है और इसकी प्रक्रिया भी शुरू हो गई है. विभाग का प्रयास है कि सभी भर्ती पूरी करके केंद्र में डॉल्फिन की पारिस्थितिकी, गंगा के प्रवाह, जल गुणवत्ता, प्रदूषण स्तर और प्रजनन चक्र जैसे विषयों पर वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए. सरकार का लक्ष्य है कि यह केंद्र भविष्य में एशिया का प्रमुख ‘रिवर इकोलॉजी मॉडल संस्थान’ बने.“-आनंद किशोर, प्रधान सचिव,वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग

गंगा की डॉल्फिन, स्वच्छ पानी की सूचक: डॉल्फिन केवल एक जीव नहीं, बल्कि नदी की स्वास्थ्य संकेतक मानी जाती है. जहां गंगा स्वच्छ और जीवंत होती है, वहीं डॉल्फिन फलती-फूलती हैं. अगर पानी में प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा या औद्योगिक अपशिष्ट बढ़ जाता है, तो डॉल्फिन सबसे पहले प्रभावित होती है.

हाथीदह में 100 से अधिक डॉल्फिन 

संरक्षण के प्रयास में डॉल्फिन मित्रों की अहम भूमिका: बिहार में गंगा डॉल्फिन की सुरक्षा के लिए “डॉल्फिन मित्र कार्यक्रम’ चलाया जा रहा है. इसके तहत नाविकों, मछुआरों और स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षित किया जाता है ताकि वे नदी में डॉल्फिन के आवास की निगरानी कर सकें. इसके अलावा ‘प्रोजेक्ट डॉल्फिन’ के तहत राज्य सरकार और पर्यावरण विभाग ने मिलकर कई संरक्षण पहलें शुरू की हैं. इसमें नदी में शोर और यातायात को नियंत्रित करने, जालों के इस्तेमाल पर निगरानी रखने और जल की गुणवत्ता सुधारने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है.

खतरे में डॉल्फिन: गंगा डॉल्फिन पर कई तरह के खतरे मंडरा रहे हैं. इन खतरों के कारण कई इलाकों में डॉल्फिनों की संख्या धीरे-धीरे घटती जा रही है. जल प्रदूषण डॉल्फिन के जीवन का सबसे बड़ा दुश्मन है. औद्योगिक और घरेलू अपशिष्ट लगातार गंगा में गिर रहे हैं. जल प्रवाह में कमी भी एक बड़ी समस्या है. बांधों और बैराजों के कारण गंगा का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है, जिससे डॉल्फिन के आवास सिकुड़ते जा रहे हैं.

सुल्तानगंज में सबसे अधिक डॉल्फिन 

मछली पकड़ने के जाल में फंसकर हर साल कई डॉल्फिन मर जाती हैं. वहीं शोर और नाव यातायात उनके संचार तंत्र (इको लोकेशन) को प्रभावित करता है. कई नाव जिनके प्रोपेलर जाली से ढके हुए नहीं होते, उनके प्रोपेलर में कट कर डॉल्फिन मर जाती हैं.

गंगा नदी की आत्मा है गंगा डॉल्फिन:डॉल्फिन दिवस हमें यह याद दिलाता है कि गंगा की मुस्कुराहट तभी कायम रह सकती है जब हम उसकी सेहत का ध्यान रखें. डॉल्फिन केवल नदी की सुंदरता नहीं, बल्कि उसकी आत्मा है. जैसा कि डॉ. आर.के. सिन्हा और प्रांतोष कुमार दास बताते हैं, अगर हम गंगा को साफ और प्रवाहमान रखेंगे, तो डॉल्फिन खुद अपने आप लौट आएगी. गंगा बचेगी तभी डॉल्फिन बचेगी, और डॉल्फिन बचेगी तभी गंगा नदी जिंदा रहेगी.

बिहार की नदियों में 35% गंगा डॉल्फिन 

5 अक्टूबर को डॉल्फिन दिवस: बिहार में हर साल पांच अक्टूबर को डॉल्फिन दिवस मनाया जाता है, जिसे राष्ट्रीय गंगा डॉल्फिन दिवस के रूप में जाना जाता है. इस दिन का उद्देश्य लुप्तप्राय गंगा नदी डॉल्फिन के संरक्षण के लिए जागरुकता फैलाना है.

Darbhanga Office: