टेंशन में बिहार के माननीय! 60% MLA को दूसरी बार के इलेक्शन में चखना पड़ता है हार का स्वाद।

टेंशन में विधायक जी!: राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि इस बार भी कई विधायकों का टिकट कटेगा और कई विधायक चुनाव में हारेंगे. क्योंकि सरकार से अधिक विधायकों का एंटी इनकंबेंसी ज्यादा है. नेताओं का भी कहना है कि चुनाव लड़ना अब आसान नहीं है. लोगों की उम्मीद बढ़ गई है. मतदाता जागरूक हो गए हैं और खर्च भी काफी बढ़ गया है. जब से ईवीएम आया है तब से मुश्किल और बढ़ गयी है, क्योंकि बूथ लूटना अब संभव नहीं रह गया है. लोग जिसे चाहेंगे वही विधायक बनेगा.

विधानसभा चुनाव का रिकॉर्ड विधायकों की बढ़ा रहा टेंशन।

टेंशन टिकट की..: लोकसभा चुनाव में राजद के विधायकों में से 35 ऐसे विधायक थे जो अपने विधानसभा में पिछड़ गए थे. उस समय तेजस्वी यादव ने टिकट काटने चेतावनी भी दी थी. वहीं 2020 विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान के कारण जदयू के कई विधायक चुनाव हार गए थे. इस बार उनकी धड़कन इसलिए बढ़ी हुई है कि फिर से टिकट पार्टी देगी या नहीं.

दो चुनाव में 60% विधायक आउट: राजनीतिक विशेषज्ञ अरुण पांडे का कहना है कि विधानसभा चुनाव में लगातार 60% के करीब विधायक फिर से चुनकर नहीं आ रहे हैं और इस बार होने वाले चुनाव में भी कमोबेश यही स्थिति रहने वाली है. क्योंकि इस बार सरकार से अधिक विधायकों के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी काम कर रहा है.

कई विधायकों का टिकट भी कटेगाऔर ऐसे 50 से अधिक विधायक इस बार बेटिकट हो सकते हैं. अब मतदाता भी जागरूक हो गए हैं. ऐसे नीतीश कुमार विधायकों के टिकट कम ही काटते हैं, लेकिन 2020 में 115 में से केवल 43 विधायक ही जीते थे. इसके कारण जदयू तीसरे नंबर पर आ गई थी.

दिख सकते हैं नए चेहरे :इस बार कई विधायक चुनाव नहीं भी लड़ेंगे. विधायकों के खिलाफ लोगों में नाराजगी का कारण उनका विधायक फंड भी है. इसमें ठेकेदारी से लेकर कमीशन तक का मामला है. कुल मिलाकर 2015 और 2020 में 60% के करीब विधायक चुनकर फिर से नहीं आए थे तो इस बार उससे अधिक नए चेहरे विधानसभा में देखने को मिलेंगे.

राजनीतिक विशेषज्ञ अरुण पांडे

“इस बार कई विधायकों का टिकट इसलिए भी कटेगा क्योंकि जब नीतीश कुमार को सदन में बहुमत सिद्ध करना था, तो उसमें कई विधायक बागी हो गए थे. उनपर ईओयू की भी कार्रवाई हो रही है. वैसे विधायकों में से कई का टिकट कटना इस बार तय है.”अरुण पांडे, राजनीतिक विशेषज्ञ

2010 से 2020 तक के विधानसभा चुनाव में आए रिजल्ट के आंकड़ों को संकलित कर प्रकाशित करने वाले पत्रकार वीरेंद्र यादव का कहना है कि 2010 में जितने विधायक जीते थे, उसमें से 151 विधायक 2015 में नहीं आ पाए. कुछ का टिकट कट गया तो बड़ी संख्या में चुनाव हार गए थे. सबसे अधिक बीजेपी के विधायक थे.

“उसी तरह 2015 में जीते विधायक में से 146 विधायक 2020 के विधानसभा चुनाव में जीत कर नहीं आए. इसमें भी कुछ का टिकट कटा था, लेकिन बड़ी संख्या में चुनाव हार गए थे.“- वीरेंद्र यादव, स्वतंत्र पत्रकार

तीन बार विधायक रहे आरजेडी नेता सतीश कुमार का कहना है कि “अब चुनाव लड़ना आसान नहीं रह गया है. जनता जागरुक हो गई है. कई तरह की उम्मीद आप अपने विधायकों से करते हैं और चुनाव में खर्च भी काफी हो रहा है. कई बार खर्च भी हावी हो जाता है. सबके लिए अब चुनाव लड़ना संभव भी नहीं है.

‘विकास चाहती है जनता’: वही जदयू प्रवक्ता मनीष यादव का कहना है कि अब मतदाता विकास चाहता है. पहले वाली बात नहीं है कि बूथ लूट कर लोग जीत जाते थे. अब ईवीएम से वोटिंग होती है. बूथ लूटना संभव नहीं रह गया है. ऐसे में जो विकास नहीं करेंगे जनता उन्हें रिजेक्ट कर देगी.

“जनता जागरुक है और काम चाहती है. जब मौका मिलेगा और काम नहीं करेंगे तो रिजेक्ट हो जाएंगे. पहले वाला हिसाब नहीं है.”– मनीष यादव, प्रवक्ता जदयू

ऐसे तो हर चुनाव में बड़ी संख्या में नए चेहरे विधानसभा में दिखते हैं. झारखंड बंटवारे के बाद 2005 में दो बार चुनाव हुए थे. 2005 फरवरी में जीते 70 से अधिक विधायक जब नवंबर 2005 में विधानसभा का चुनाव हुआ तो दोबारा विधानसभा का मुंह नहीं देख पाए. 2010 विधानसभा चुनाव में भी 60% से अधिक नए चेहरे विधानसभा पहुंचे थे.

2005 में हारे विधायकों के नाम:विजय कुमार सिन्हा फरवरी 2005 में लखीसराय से चुनाव जीते, लेकिन नवंबर 2005 का चुनाव हार गए. मंत्री अशोक चौधरी कांग्रेस की टिकट पर लड़े और जीते भी थे, लेकिन बरबीघा से नवंबर 2005 में जदयू का उम्मीदवार जीत कर आया. मंत्री लेसी सिंह जो 2005 फरवरी में धमदाहा से चुनाव जीती , लेकिन नवंबर 2005 में राजद के दिलीप कुमार यादव से चुनाव हार गयीं. मशरख विधानसभा से निर्दलीय तारकेश्वर सिंह फरवरी 2005 में चुनाव जीते थे लेकिन नवंबर 2005 में हार गए. परसा से 2005 फरवरी में चंद्रिका राय राजद की टिकट पर चुनाव जीते थे लेकिन 2005 नवंबर में हार गए और छोटे लाल राय जदयू की टिकट पर चुनाव जीत गए.

 

राबड़ी की हुई थी हार: 2010 में एनडीए ने रिकॉर्ड 206 सीटों पर जीत हासिल की थी. राजद, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के अधिकांश विधायक चुनाव हार गए. पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी भी राघोपुर से विधानसभा का चुनाव हार गई थी. बड़ी संख्या में विधायकों के हारने का यह सिलसिला 2015 और 2020 में भी देखने को मिला.

जदयू प्रवक्ता मनीष यादव 

दलों की संख्या अधिक: इस बार महागठबंधन और एनडीए में भी अधिक संख्या में दल हैं. एनडीए की ही बात कर लें तो 2020 विधानसभा चुनाव में केवल चार दल थे. इस बार चिराग पासवान की पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी भी शामिल है. हालांकि वीआईपी इस बार नहीं है. वीआईपी महागठबंधन के साथ है. भाजपा जदयू को कुछ सीट छोड़ना पड़ेगा तो वहीं राजद को भी कुछ सीट छोड़ना पड़ेगा.

कई विधायकों की नहीं हुई हार:राजनीतिक विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि हर दल जीतने वाले उम्मीदवार पर ही दांव लगाना चाहता है और इस कारण भी कई विधायकों का टिकट कटता है. क्योंकि आज कई तरह की व्यवस्था है जिसके कारण विधायकों के बारे में फीडबैक पार्टी लेती है. उस हिसाब से उनके टिकट को लेकर फैसला लेती है. हालांकि इसके बावजूद कई ऐसे विधायक हैं जो 5 बार से अधिक चुनाव लड़ रहे हैं और जीत रहे हैं. बिजेंद्र यादव तो 8 बार चुनाव जीत चुके हैं. इसी तरह नंदकिशोर यादव भी लगातार चुनाव जीत रहे हैं.

2020 में कई मंत्री भी चुनाव हार गए: जमालपुर विधानसभा सीट से जदयू के ग्रामीण कार्य मंत्री शैलेश कुमार 6000 वोट से हार गए थे. वहीं जदयू कोटे के शिक्षा मंत्री रहे जहानाबाद विधानसभा सीट से कृष्ण नंदन वर्मा 33000 वोट से हार गए. औरंगाबाद विधानसभा से भाजपा के पूर्व मंत्री रामाधार सिंह चुनाव हार गए. गोविंदपुर से जदयू की पूर्णिमा यादव चुनाव हार गयीं. हिलसा विधानसभा सीट से राजद के शक्ति यादव केवल 13 वोटों से चुनाव हार गये.

2015 के विधानसभा चुनाव में भी कई बड़े नेता चुनाव हार गए थे. मंत्री नीतीश मिश्रा झंझारपुर से चुनाव हार गए थे. बीजेपी के विनोद नारायण झा चुनाव हार गए थे. मंत्री रहे सुनील कुमार पिंटू भी चुनाव हार गए थे. उदय नारायण चौधरी भी चुनाव हार गए थे. लवली आनंद शिवहर से 461 वोट से चुनाव हार गई थी.

टिकट को लेकर जोर आजमाइश: ऐसे तो अभी ना तो एनडीए में और ना ही महागठबंधन में सीटों का बंटवारा हुआ है, लेकिन सीटों को लेकर जोर आजमाइश शुरू है. सभी पार्टी कार्यालय में काफी भीड़ दिख रहा है. बड़े नेताओं के आवास पर भी टिकट लेने वालों की भीड़ दिख रही है. सिर्फ बीजेपी में 5000 से अधिक आवेदन उम्मीदवारों ने दिया है. इसी तरह उन कार्यालय में भी चुनाव लड़ने वाले टिकट के लिए आवेदन कर रहे हैं तो वहीं वर्तमान विधायक की धड़कन बढ़ी हुई है उनका टिकट बचेगा या कटेगा.

Darbhanga Office: