सहरसा में मध्य प्रदेश के नीमच जिले से आए कारीगर लक्ष्मण कुमार और उनकी टीम अपने हुनर से रोजगार चला रहे हैं। टीम में 10-12 सदस्य हैं। ये लोग मोटरसाइकिल पर सामान लेकर गांव-गांव जाते हैं। महाराष्ट्र और इंदौर से लाए गए लोहे के फ्रेम पर खटिया बनाते हैं।
इनकी खास बात यह है कि सिर्फ 20-25 मिनट में खटिया तैयार कर देते हैं। खटिया में मजबूत रस्सी का इस्तेमाल करते हैं। लोहे का फ्रेम टिकाऊ होता है और डिजाइन आकर्षक होती है। खटिया की कीमत 1200 रुपए है, जो आम लोगों की पहुंच में है।
लक्ष्मण कुमार बचपन से यह काम कर रहे हैं। अपने राज्य में रोजगार नहीं मिलने के कारण सहरसा आए। वे कहते हैं कि पेट की मजबूरी से मेहनत करने की प्रेरणा मिलती है। इसलिए वे गांव-गांव जाकर लोगों की जरूरत पूरी करते हैं।
ग्रामीण जीवन में खटिया का खास महत्व है। यह सिर्फ सोने का साधन नहीं है। यह बातचीत, मेल-मिलाप और आराम का प्रतीक भी है। इसलिए इन कारीगरों की खटिया लोगों के बीच लोकप्रिय हो गई है। स्थानीय ग्रामीण शंभू यादव कहते हैं कि बाहर से आने वाले इन कारीगरों ने मेहनत और कला से गांव की संस्कृति को और मजबूत किया है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में दे रहे योगदान
ये कारीगर अपनी आजीविका के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी योगदान दे रहे हैं। उनकी मेहनत और तेजी से काम करने की कला ने उन्हें लोगों के बीच पहचान दिला दी है। यह उदाहरण है कि कैसे सीमित साधनों के बावजूद हुनर को पूंजी बनाकर सफलता पाई जा सकती है।