आजादी की लड़ाई में बेगूसराय का योगदान:बेगूसराय के तीन सेना नायकों की वीरता की अनसुनी कहानियां।

आज देश 79वां,स्वाधीनता दिवस मना रहा है। 15 अगस्त यह सिर्फ एक तारीख नहीं बल्कि करोड़ों भारतीयों के सपनों, संघर्ष और बलिदान का प्रतीक है। आज जो हम खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं.. अपने घर, गांव, प्रखंड, जिला और प्रदेश में चैन की नींद सो पा रहे हैं या अपने विचार खुलकर रख पा रहे हैं यह सिर्फ इसलिए मुमकिन है क्योंकि देश के हजारों वीर जवान सीमा पर विषम स्थिति में रहकर हमारी सरहद पर चौबीसों घंटे चट्टान की तरह डटे हैं। हजारों वीर सपूतों ने अपना जिंदगी गंवा कर हमें यह आजादी दिलाई है।

15 अगस्त का मकसद सिर्फ झंडा फहराना और परेड देखना नहीं,बल्कि उन वीर सपूतों को याद करना है जिन्होंने यह दिन हमें अपने वतन पर फक्र और गर्व करने के लिए बनाया है। आइए जानते हैं बिहार के बेगूसराय जिले के वीरों की वीरता की कहानियां,जिनका त्याग हमेशा प्रेरित करता है। उनका साहस और नेतृत्व भारतीय इतिहास में अमर है।

 

सेना के रिटायर्ड सूबेदार आरडी मिस्त्री ।
सेना के रिटायर्ड सूबेदार आरडी मिस्त्री आज भी अपने साहस और जज्बे से जवानों के लिए मिसाल हैं। वे करगिल युद्ध में बिना डर के लड़ाई में कूद पड़े और दुश्मनों के पोस्ट पर कब्जा करते चले गए। आज भी अगर देश को उनकी जरूरत पड़े तो वे बिना झिझक तैयार हैं। हालांकि उनके बच्चे कहते हैं कि अब उनकी उम्र हो गई है,लेकिन हिम्मत कम नहीं हुई है। मिस्री गर्व से कहते हैं कि “शरीर की ताकत भले घट जाए, लेकिन जज्बा उतना ही मजबूत है।” उनकी कहानी यह सिखाती है कि देशभक्ति कभी बूढ़ी नहीं होती।

सूबेदार आरडी मिस्त्री, 1985 में सेना बहाल हुए. 30 सालों तक उन्होंने देश की सेवा की। कारगिल युद्ध के दौरान 1999 में डोगरा में राष्ट्रीय राइयफल बटालियन का हिस्सा रहे.. वो बताते हैं कि करगिल युद्ध हुआ तो मैं टारगेट लेकर काम करना शुरू किया। मेरा लक्ष्य था कि हर दिन दुश्मनों के 5 से 10 पोस्ट को तबाह करना। हर दिन दीवाली मनती थी। वो बताते हैं कि शहीदों के परिवार से आज भी संपर्क में रहता हूं। उनकी समस्याओं को दूर करने की कोशिश करता हूं।

मां की रक्षा के लिए जान भी चली जाएं तो कम है- शरण सिंह।

तेघड़ा ब्लॉक के रहने वाले सेना से रिटायर्ड शरण सिंह।
जिले के तेघड़ा ब्लॉक के रहने वाले सेना से रिटायर्ड शरण सिंह बताते हैं कि वो लंबे समय तक सियाचिन गलेश्यिर में तैनात रहे। वहां की क्लाइमेट बहुत अलग है। सियाचिन जाना ही मुश्किल है और वहां पर रहकर काम करना तो और भी मुश्किल। 1971 की लड़ाई को याद करते हुए शरण सिंह बताते हैं कि उन्होंने दुश्मनों को बर्फ की पहाड़ पर धूल चटा दी थी। फौज में जाने वाले युवाओं से वो कहना चाहते हैं कि मां की रक्षा के लिए अगर आपका सिर भी कट जाए तो हंसते-हंसते कटवा लें।

तेघड़ा ब्लॉक के आधारपुर गांव के सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी साकेत कुमार 1996 में भारतीय सेना में शामिल हुए।

जम्मू-कश्मीर के दुर्गम क्षेत्र कारगिल में तैनाती के दौरान उन्होंने 1999 के युद्ध में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था । युद्ध के दौरान कई साथी शहीद हुए और कई घायल हुए। साकेत कुमार बताते हैं कि आज भी उन दृश्यों की याद से रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

सीमाओं पर दुश्मन से सीधी टक्कर हो या 1971, 1999 का युद्ध इन वीरों का साहस और त्याग हमेशा अमर रहेगा। उनका सम्मान केवल शब्दों में नहीं, बल्कि देश की सेवा और एकता के संकल्प में भी करना जरूरी है।

22 वर्षों तक देश की सेवा करने के बाद साकेत कुमार कहते हैं कि फौजी जीवन अनुशासन से भरा होता है। इसलिए सेवानिवृत्ति के बाद सामान्य जीवन में एडजेस्ट करने में काफी वक्त लगता है। उनका मानना है कि एक फौजी हमेशा देश के लिए सर्वोत्तम बलिदान देने को तैयार रहता है।

बेगूसराय जिले के पहले स्वतंत्रता सेनानी की शहादत की कहानी

बछवाड़ा प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत बछवाड़ा गांव में पैदा स्वतंत्रता सेनानी उमाकांत चौधरी के कलेजे में बदले की आग धधक रही थी। वे जुल्म करने वाले अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लगातार विरोध और डटकर मुकाबला कर रहे थे। 17 अगस्त 1942 को स्वतंत्रता सेनानी उमाकांत चौधरी अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेते हुए शहीद हो गए। बिहार के बेगूसराय जिले के उमाकांत चौधरी ने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी।

स्थानीय निवासी सह सेवानिवृत शिक्षक हरेंद्र चौधरी बताते हैं कि 9 अगस्त 1942 को अंग्रेजों के खिलाफ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने करो और मरो का नारा दिया था, जिसके बाद 17 अगस्त 1942 ई को बछवाड़ा गांव के स्वतंत्रता सेनानियों की टोली ने अंग्रेजों का संचार व्यवस्था को भंग कर चौदमुहा पुल के समीप रेलवे ट्रैक को उखाड़ फेंका, इससे अंग्रेजी हुकूमत ने लोगों पर फायरिंग करने का आदेश दे दिया। जवानों ने जिले के चौदमुहा पुल पर से अंधाधुंध गोली चलानी शुरू की, जिसमें उमाकांत चौधरी हाथ में तिरंगा लिए भारत माता का जयकारा लगाते हुए अंग्रेजों से मुकाबला करने के लिए आगे बढ़े। उनके हौसले टूटे नहीं और भारत माता की जय का नारा लगाते हुए अंग्रेज जवानों के हाथों सीने पर गोली खाकर प्राणों की आहुति दे दी।

बेगूसराय जिले में उमाकांत चौधरी पहले शख्सियत थे,जिन्होंने देश की आजादी के लिए पहली शहादत दी थी। जिनसे प्रेरणा लेकर जिले के कई लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत से लड़ाई लड़ते हुए अपने आपको देश के प्रति समर्पित कर दिया। इनके त्याग और समर्पण पर बछवाड़ा गांव और पूरे जिले को गर्व है। उनकी याद में बछवाड़ा गांव के लोगों ने एक भव्य स्मारक और बछवाड़ा बाजार के समीप स्मृति द्वार बनाया है। स्थानीय लोग और जनप्रतिनिधि प्रत्येक वर्ष शहीद स्थल पर जाकर 17 अगस्त को शहादत दिवस धूमधाम से मनाते हैं।

देश के लिए शहादत देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के स्मारकों की स्थिति और उनके स्मृति द्वार के लिए सरकार की तरफ से कोई व्यवस्थाएं नहीं होने से लोगों में नाराजगी है। लोगों का मानना है कि यदि सरकार स्मारकों पर ध्यान दे तो क्षेत्र के लिए आकर्षण का केंद्र होगा और युवाओं और आने वाली पीढ़ियों को सेना में जाने की प्रेरणा मिलेगी।

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