ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सोमवार को चेतावनी दी कि अगर चुनाव आयोग पर्याप्त समय और सुरक्षा उपायों के बिना मतदाता सूची के अपने स्पेशल इंटेनसिव रिविजन (SIR) को आगे बढ़ाता है, तो बिहार में लाखों लोग अपनी नागरिकता और आजीविका खो सकते हैं.
प्रक्रिया को जल्दबाजी और अव्यवहारिक बताते हुए ओवैसी ने कहा कि 15-20 प्रतिशत की त्रुटि दर भी राज्य चुनावों से पहले हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए विनाशकारी परिणाम हो सकती है. दिल्ली में ईसीआई कार्यालय का दौरा करने के बाद बोलते हुए ओवैसी ने कहा, “…अगर लिस्ट से 15-20 प्रतिशत लोग भी छूट जाते हैं, तो वे अपनी नागरिकता भी खो देंगे… हम SIR के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन समय दिया जाना चाहिए.”
आजीविका के अधिकार भी खतरे में
उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर जल्दबाजी में यह प्रक्रिया की गई, तो इससे न केवल लोगों के मतदान के अधिकार छिन जाएंगे, बल्कि उनकी आजीविका के अधिकार भी खतरे में आ जाएगा. ओवैसी ने कहा, “अगर किसी का नाम हटाया जाता है, तो वह व्यक्ति न केवल अपना वोट देने से चूक जाएगा, बल्कि यह उसकी आजीविका का भी मुद्दा है.”
AIMIM प्रमुख ने कहा, “हमारा एकमात्र मुद्दा यह है कि चुनाव आयोग इतने कम समय में इस तरह की कवायद कैसे कर सकता है? लोगों को इस समस्या का सामना करना पड़ेगा और हमने व्यावहारिक कठिनाइयों को उजागर करते हुए इन मुद्दों को चुनाव आयोग के सामने रखा है.”
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में एसआईआर आयोजित करने के चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 10 जुलाई को सुनवाई करने पर सहमति जताई थी.जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, गोपाल शंकरनारायणन और शादान फरासत को याचिकाओं की अग्रिम प्रतियां चुनाव आयोग को देने की अनुमति दी.
बता दें कि याचिकाकर्ताओं, आरजेडी सांसद मनोज झा, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा और बिहार के पूर्व विधायक मुजाहिद आलम ने चुनाव आयोग के 24 जून के निर्देश को रद्द करने की मांग की है, जिसके तहत मतदाताओं को मतदाता सूची में बने रहने के लिए नागरिकता का प्रमाण प्रस्तुत करना अनिवार्य है.
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि यह कदम नए दस्तावेजों की आवश्यकता को लागू करता है और गलत तरीके से नागरिकों पर सबूतों का बोझ डालता है. उन्होंने चेतावनी दी कि इससे ग्रामीण बिहार में गरीब और हाशिए पर पड़े मतदाताओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, खासकर आधार और राशन कार्ड जैसे व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले दस्तावेजो के अभाव में.
एडीआर ने अपनी याचिका में कहा, “अगर एसआईआर आदेश को रद्द नहीं किया जाता है, तो यह मनमाने ढंग से और उचित प्रक्रिया के बिना लाखों मतदाताओं को अपने प्रतिनिधियों को चुनने से वंचित कर सकता है, जिससे देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव और लोकतंत्र बाधित हो सकता है, जो संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं.”
मनोज झा ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि संशोधन का इस्तेमाल मतदाता सूचियों के आक्रामक और अपारदर्शी संशोधनों को सही ठहराने के लिए किया जा रहा है, जो मुस्लिम, दलित और गरीब प्रवासी समुदायों को असंगत रूप से लक्षित करते हैं.”
25 जुलाई तक जमा होंगे दस्तावेज
चुनाव आयोग के अनुसार रविवार तक 1,69,49,208 गणना फॉर्म प्राप्त हो चुके थे, जो बिहार के लगभग 7.90 करोड़ रजिस्टर वोटर्स (7,89,69,844) का 21.46 प्रतिशत है. पिछले 24 घंटों में ही 65,32,663 फॉर्म जमा किए गए. आयोग ने कहा कि मतदाताओं के पास दस्तावेज जमा करने के लिए 25 जुलाई तक का समय है, और जिनके नाम 1 अगस्त को प्रकाशित होने वाले मसौदा रोल में हैं, उन्हें जांच और आपत्ति अवधि के दौरान दस्तावेज प्रदान करने के लिए और अवसर मिलेंगे.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा, पिछले 4 महीनों के दौरान, सभी 4,123 निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ERO), सभी 775 जिला चुनाव अधिकारियों (DEO) और सभी 36 मुख्य चुनाव अधिकारियों (CEO) ने 28,000 राजनीतिक दल के प्रतिनिधियों के साथ लगभग 5,000 बैठकें की हैं.